छठ पूजा कब है?
उत्तर
रविवार, 15 नवम्बर 2026
षष्ठी। अस्ताचल एवं उदयाचल सूर्य को अर्घ्य।
उसी दिन क्यों
- यह कौन-सी तिथि है
- कार्तिक शुक्ल 6
सामान्य नियम से: वह दिन जिसके सूर्योदय पर यह तिथि चल रही हो।
उसके बाद
गुरुवार, 04 नवम्बर 2027
कार्तिक शुक्ल 6
सोमवार, 23 अक्टूबर 2028
कार्तिक शुक्ल 6
यह तिथि कैसे निकली
त्योहार एक स्थिति है, तारीख़ नहीं। चांद्र मास का नाम उस राशि से पड़ता है जिसमें सूर्य उस अमावस्या पर हो जो मास आरंभ करती है, और तिथि सूर्य से चंद्रमा की दूरी है, बारह-बारह अंश में। दोनों उसी गणना से आते हैं जिससे यह साइट कुंडली बनाती है।
उत्तर भारत मास पूर्णिमा से पूर्णिमा तक गिनता है, इसलिए कृष्ण पक्ष अगले मास का नाम लेता है — वही दिन पुणे में श्रावण कृष्ण तृतीया है और दिल्ली में भाद्रपद कृष्ण तृतीया। यहाँ उत्तर की गणना है, और तिथि ऊपर छपी है ताकि कुछ भी मानना न पड़े।
क्यों मनाई जाती है
कार्तिक शुक्ल षष्ठी — चार दिन का व्रत, और भारत का इकलौता बड़ा पर्व जिसमें डूबते सूर्य को पहले अर्घ्य दिया जाता है और उगते को बाद में। कारण साफ़ है: परंपरा में जो ढल रहा है उसे पहले नमन किया जाता है। सूर्य और उनकी बहन षष्ठी देवी — छठी मैया — दोनों की पूजा है; छठी मैया संतान की रक्षक मानी जाती हैं, इसीलिए जन्म के छठे दिन भी उन्हीं की पूजा होती है। इस व्रत में न मूर्ति है, न मंदिर, न पंडित — जल में खड़े होकर सीधे सूर्य को अर्घ्य, और छत्तीस घंटे निर्जला।
कथा
प्रियव्रत और मालिनी
राजा प्रियव्रत की कोई संतान न थी। कश्यप ऋषि ने यज्ञ कराया और रानी मालिनी को पुत्र हुआ — पर वह मरा हुआ जन्मा।
देवसेना
राजा शोक में श्मशान में बैठे थे। तभी एक देवी प्रकट हुईं और बोलीं — मैं ब्रह्मा की मानस पुत्री देवसेना हूँ, षष्ठी। मेरी पूजा करो।
व्रत
राजा ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी को व्रत किया और बालक जीवित हो उठा।
दूसरी कथा
एक और कथा कर्ण की है — सूर्यपुत्र कर्ण घंटों जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। छठ का अर्घ्य उसी क्रिया की स्मृति है।
तीसरी कथा
वनवास में द्रौपदी ने भी सूर्य की यही उपासना की थी, और महाभारत में उसी से अक्षय पात्र मिला।
सामग्री
- बाँस का सूप और दउरा — प्लास्टिक नहीं, यह नियम कड़ा है
- ठेकुआ — गुड़ और आटे का, घी में; छठ का मुख्य प्रसाद
- गन्ना पूरा, पत्तों समेत
- नारियल, केला (पूरा घौद), सिंघाड़ा, सुथनी, नींबू (डाभ)
- गुड़, गेहूँ का नया आटा, चावल का लड्डू (कसार)
- मिट्टी के दीये और सरसों का तेल
- सिंदूर — नाक से माँग तक लगाने के लिए
- पीतल या ताँबे का लोटा, दूध और गंगाजल — अर्घ्य के लिए
- हल्दी और मूली की गाँठ, पत्तों समेत
पूजा विधि
1
पहला दिन — नहाय खाय
चतुर्थी। घर की पूरी सफ़ाई, गंगा या नदी में स्नान, और एक ही बार भोजन — कद्दू-भात, चने की दाल, अरवा चावल। सेंधा नमक ही।
2
दूसरा दिन — खरना
पंचमी। दिन भर निर्जला। संध्या को गुड़ की खीर, रोटी और केला — व्रती अकेले, चुपचाप खाती हैं। उसी क्षण से छत्तीस घंटे का निर्जला व्रत शुरू।
3
तीसरा दिन — संध्या अर्घ्य
षष्ठी। दिन भर ठेकुआ और प्रसाद बनता है। शाम को परिवार दउरा लेकर घाट जाता है; व्रती जल में खड़े होकर डूबते सूर्य को अर्घ्य देती हैं।
4
कोसी भरना
अर्घ्य की रात घर या घाट पर गन्ने का मंडप बनाकर उसके नीचे दीप जलाए जाते हैं — जिनकी मनोकामना पूरी हुई हो वे यह करते हैं।
5
चौथा दिन — उषा अर्घ्य
सप्तमी। सूर्योदय से पहले घाट पर पहुँचकर उगते सूर्य को अर्घ्य। यही व्रत का अंत है।
6
पारण
अर्घ्य के बाद कच्चे दूध और प्रसाद से व्रत खोला जाता है, और घाट पर ही सब में ठेकुआ बाँटा जाता है।
क्या करें
- सूप और दउरा बाँस का ही लें। छठ में प्लास्टिक की टोकरी नहीं चलती — यह इस व्रत की सबसे कड़ी शर्त है।
- संध्या अर्घ्य पहले, उषा अर्घ्य बाद में — क्रम उल्टा नहीं होता।
- प्रसाद बनाते समय स्नान करके ही रसोई में जाएँ, और वह चूल्हा-बर्तन अलग रखें जो पूरे चार दिन केवल छठ के लिए हो।
- ठेकुआ में गुड़ ही लें, चीनी नहीं।
- घाट पर व्रती के पीछे परिवार का कोई सदस्य दउरा लेकर चले — दउरा ज़मीन पर नहीं रखा जाता।
- प्रसाद घाट पर ही सबको बाँटें, चाहे कोई भी हो।
क्या न करें
- प्रसाद बनाते या छूते समय जूठा न करें — चखकर देखना भी वर्जित है।
- छठ के चार दिन घर में प्याज़, लहसुन और माँस नहीं।
- व्रती बिस्तर पर न सोएँ — ज़मीन पर चादर बिछाकर।
- अर्घ्य के जल में साबुन, तेल या इत्र लगाकर न उतरें।
- घाट पर जूते-चप्पल पहनकर न जाएँ; रास्ते भर नंगे पाँव चलने की परंपरा है।
- प्रसाद में चीनी, रिफ़ाइंड तेल और बासी सामग्री न लें।
आरती
छठी मैया की आरती
जय छठी मैया, जय छठी मैया।
सूरज देव की बहना, जग की तू दैया॥
कार्तिक शुक्ल षष्ठी, व्रत तेरा भारी।
छत्तीस घंटे निर्जल, रहे व्रती नर-नारी॥
सूप में ठेकुआ सोहे, गन्ना संग केला।
घाट किनारे सजता, भक्ति का मेला॥
डूबते को अर्घ्य पहले, फिर उगते को दीजै।
यह रीति निराली, तेरी माता कीजै॥
संतान की रक्षा करती, तू ही षष्ठी माता।
जो तेरा व्रत धारे, सूना घर भर जाता॥
जय छठी मैया की आरती, जो कोई नर गावे।
मन की मुराद पावे, कुल उजियारा छावे॥
आकाश का अपना कैलेंडर है। आपका भी।
वही गणना आपके जन्म-क्षण पर — हर भाव, हर ग्रह, हर दशा तिथियों सहित।
