देवशयनी एकादशी कब है?

उत्तर

बुधवार, 14 जुलाई 2027

विष्णु शयन; कार्तिक तक विवाह नहीं।

उसी दिन क्यों

यह कौन-सी तिथि है
आषाढ़ शुक्ल 11

सामान्य नियम से: वह दिन जिसके सूर्योदय पर यह तिथि चल रही हो।

उसके बाद

  • रविवार, 02 जुलाई 2028

    आषाढ़ शुक्ल 11

  • शनिवार, 21 जुलाई 2029

    आषाढ़ शुक्ल 11

यह तिथि कैसे निकली

त्योहार एक स्थिति है, तारीख़ नहीं। चांद्र मास का नाम उस राशि से पड़ता है जिसमें सूर्य उस अमावस्या पर हो जो मास आरंभ करती है, और तिथि सूर्य से चंद्रमा की दूरी है, बारह-बारह अंश में। दोनों उसी गणना से आते हैं जिससे यह साइट कुंडली बनाती है।

उत्तर भारत मास पूर्णिमा से पूर्णिमा तक गिनता है, इसलिए कृष्ण पक्ष अगले मास का नाम लेता है — वही दिन पुणे में श्रावण कृष्ण तृतीया है और दिल्ली में भाद्रपद कृष्ण तृतीया। यहाँ उत्तर की गणना है, और तिथि ऊपर छपी है ताकि कुछ भी मानना न पड़े।

क्यों मनाई जाती है

आषाढ़ शुक्ल एकादशी — इसी दिन से विष्णु चार महीने के लिए शयन में जाते हैं और कार्तिक की देवउठनी एकादशी को जागते हैं। बीच के इन चार महीनों को चातुर्मास कहते हैं, और इसी कारण इस अवधि में विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक कार्य नहीं होते — यही इस दिन की सबसे व्यावहारिक बात है, और यही लोग सबसे ज़्यादा पूछते हैं। चातुर्मास वर्षा का समय है; परंपरा में संन्यासी इन चार महीनों में यात्रा रोककर एक स्थान पर रुक जाते हैं।

कथा

राजा मांधाता

सत्ययुग में राजा मांधाता के राज्य में तीन वर्ष वर्षा नहीं हुई। प्रजा भूख से मरने लगी।

अंगिरा ऋषि

राजा वन में गए और अंगिरा ऋषि से उपाय पूछा। ऋषि ने कहा — राज्य में कोई अपने धर्म से हटा है, पर उपाय दंड नहीं है।

व्रत

ऋषि ने आषाढ़ शुक्ल एकादशी का व्रत बताया। राजा ने पूरी प्रजा के साथ व्रत किया और वर्षा हुई।

बलि और वामन

दूसरी कथा में वामन ने बलि को पाताल भेजा, पर बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर वचन दिया कि वे चार महीने उसके पास रहेंगे। वही चार महीने चातुर्मास हैं।

शयन

इसीलिए इसे पद्मनाभा या हरिशयनी एकादशी भी कहते हैं — विष्णु क्षीरसागर में शेष पर शयन करते हैं।

सामग्री

  • विष्णु की शयन मुद्रा वाली प्रतिमा या चित्र
  • तुलसी दल — बिना तुलसी विष्णु का भोग नहीं
  • पीले वस्त्र, पीले फूल, चंदन
  • पंचामृत — दूध, दही, घी, शहद, शक्कर
  • कलश, आम के पत्ते, नारियल
  • मौसमी फल, पंजीरी, खीर
  • चातुर्मास के संकल्प के लिए मन में तय किया एक त्याग
  • एकादशी व्रत कथा की पुस्तक

पूजा विधि

  1. 1

    दशमी

    एक दिन पहले एक बार सात्विक भोजन और सूर्यास्त के बाद कुछ नहीं। व्रत यहीं से शुरू माना जाता है।

  2. 2

    संकल्प

    एकादशी को स्नान कर विष्णु के सामने व्रत का संकल्प, और साथ ही चातुर्मास का संकल्प — कोई एक वस्तु या आदत जो चार महीने छोड़नी है।

  3. 3

    शयन पूजन

    विष्णु को पीले वस्त्र, चंदन, तुलसी दल। परंपरा में आज उन्हें शयन कराया जाता है — प्रतिमा को लिटाकर, ‘सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्’।

  4. 4

    पाठ

    विष्णु सहस्रनाम या एकादशी कथा। रात्रि जागरण की परंपरा है।

  5. 5

    दान

    अन्न, वस्त्र और छाता-चप्पल का दान — वर्षा के महीने का पारंपरिक दान।

  6. 6

    द्वादशी पारण

    अगले दिन निर्धारित मुहूर्त में पारण। पहले किसी को भोजन कराएँ।

क्या करें

  • चातुर्मास का संकल्प आज ही लें और वह छोटा और निभाने योग्य हो — एक चीज़, चार महीने। परंपरा में यही इस दिन का असली काम है।
  • पारण द्वादशी के मुहूर्त में करें; समय निकल जाना एकादशी व्रत का सबसे बड़ा दोष माना जाता है।
  • तुलसी दल भोग में रखें, पर तोड़ें एक दिन पहले।
  • आज से चार महीने विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक कार्य नहीं होते — तारीख़ तय करनी हो तो देवउठनी एकादशी के बाद देखें।
  • वर्षा के महीने में छाता, चप्पल और अन्न का दान परंपरा में विशेष माना गया है।

क्या न करें

  • आज चावल बिल्कुल नहीं — एकादशी का यह सबसे स्पष्ट नियम है।
  • एकादशी के दिन तुलसी न तोड़ें।
  • चातुर्मास में विवाह, सगाई, गृहप्रवेश, मुंडन और नया निर्माण आरंभ नहीं होता।
  • प्याज़, लहसुन, मसूर दाल और तामसिक भोजन नहीं।
  • दिन में सोना और किसी की निंदा — दोनों एकादशी में वर्जित माने जाते हैं।

आरती

ॐ जय जगदीश हरे

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।

भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥

जो ध्यावे फल पावे, दुख बिनसे मन का।

सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ किसकी।

तुम बिनु और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥

तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतर्यामी।

पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।

मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥

शयन करो हे स्वामी, चार मास तक तुम।

जागो कार्तिक मासे, फिर मंगल हो हम॥

आकाश का अपना कैलेंडर है। आपका भी।

वही गणना आपके जन्म-क्षण पर — हर भाव, हर ग्रह, हर दशा तिथियों सहित।

कहीं अटक गए, या कुछ ठीक नहीं लग रहा?

हर संदेश एक इंसान पढ़ता है — कोई बॉट नहीं। अपनी कुंडली, रिपोर्ट, भुगतान या ऑर्डर — किसी भी बारे में पूछिए। सुबह 9 से रात 9, रोज़।