धनतेरस कब है?
उत्तर
शुक्रवार, 06 नवम्बर 2026
त्रयोदशी। धातु ख़रीदी जाती है।
प्रदोष काल पूजा मुहूर्त
मुहूर्त
शाम 5:32 – 7:56
- अवधि
- 2 घंटे 24 मिनट
- सूर्यास्त
- शाम 5:32
- प्रदोष काल
- शाम 5:32 – 7:56
प्रदोष काल स्थानीय सूर्यास्त से आरंभ होकर छह घटिका — तीन मुहूर्त, 2 घंटे 24 मिनट — चलता है, जैसा निर्णयसिंधु और धर्मसिंधु में है। यह सूर्यास्त के साथ खिसकता है, इसलिए हर वर्ष और हर नगर में घड़ी का समय अलग होता है। ऊपर का मुहूर्त उसी का वह भाग है जिसमें तिथि सचमुच चल रही हो।
उसी दिन क्यों
- यह कौन-सी तिथि है
- कार्तिक कृष्ण 13
यह सूर्योदय से नहीं, प्रदोष से तय होती है। तिथि उस दिन के सूर्योदय पर चल सकती है जिसकी संध्या तक वह बीत चुकी हो — और इसी से सामान्य गणना वाला कैलेंडर एक दिन पीछे रह जाता है।
उसके बाद
बुधवार, 27 अक्टूबर 2027
कार्तिक कृष्ण 13
शाम 5:40 – रात 8:04
सोमवार, 16 अक्टूबर 2028
कार्तिक कृष्ण 13
यह तिथि कैसे निकली
त्योहार एक स्थिति है, तारीख़ नहीं। चांद्र मास का नाम उस राशि से पड़ता है जिसमें सूर्य उस अमावस्या पर हो जो मास आरंभ करती है, और तिथि सूर्य से चंद्रमा की दूरी है, बारह-बारह अंश में। दोनों उसी गणना से आते हैं जिससे यह साइट कुंडली बनाती है।
उत्तर भारत मास पूर्णिमा से पूर्णिमा तक गिनता है, इसलिए कृष्ण पक्ष अगले मास का नाम लेता है — वही दिन पुणे में श्रावण कृष्ण तृतीया है और दिल्ली में भाद्रपद कृष्ण तृतीया। यहाँ उत्तर की गणना है, और तिथि ऊपर छपी है ताकि कुछ भी मानना न पड़े।
क्यों मनाई जाती है
कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी, दिवाली से दो दिन पहले। असली कारण धन नहीं है — समुद्र मंथन से इसी दिन धन्वंतरि अमृत का कलश लेकर निकले थे, और वे आयुर्वेद के देवता हैं। इसीलिए भारत सरकार इसी दिन राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस मनाती है। धातु ख़रीदने की परंपरा उस कलश से जुड़ी है — कलश धातु का था और भरा हुआ था। शाम को घर के बाहर दक्षिण दिशा में जो अकेला दीपक रखा जाता है, वह यम के लिए है, लक्ष्मी के लिए नहीं — उसे यम दीपक कहते हैं।
कथा
राजा हिम का पुत्र
राजा हिम के बेटे की कुंडली में लिखा था कि विवाह के चौथे दिन साँप के डसने से उसकी मृत्यु होगी।
नववधू की युक्ति
उसकी नई पत्नी ने चौथी रात उसे सोने नहीं दिया। उसने घर के द्वार पर अपने सारे गहने और सोने-चाँदी के सिक्के ढेर कर दिए और चारों ओर दीपक जला दिए।
कथा और गीत
रात भर वह कहानियाँ सुनाती और गाती रही ताकि पति जागता रहे।
यम का लौटना
यम साँप के रूप में आए, पर दीपकों और सोने की चमक से उनकी आँखें चौंधिया गईं। वे ढेर पर बैठकर रात भर कथा सुनते रहे और सुबह चुपचाप लौट गए।
यम दीपक
इसीलिए धनतेरस की संध्या को दक्षिण दिशा में यम के नाम का दीपक जलाया जाता है — अकाल मृत्यु से बचाव के लिए।
सामग्री
- नया धातु का पात्र — चाँदी, पीतल या स्टील (जो सामर्थ्य हो)
- धनिये के बीज — परंपरा में इन्हें ख़रीदकर बोया जाता है
- धन्वंतरि, लक्ष्मी और कुबेर का चित्र
- आटे का चौमुखी दीपक और सरसों का तेल — यम दीपक के लिए
- काले तिल — यम दीपक की बाती के नीचे
- झाड़ू — इसी दिन ख़रीदी जाती है, लक्ष्मी का प्रतीक मानकर
- गेंदे के फूल, रोली, अक्षत, कलावा
- मिठाई और गुड़
पूजा विधि
1
ख़रीद
दिन में धातु ख़रीदें। परंपरा में ख़रीदी हुई वस्तु ख़ाली घर न लाएँ — उसमें कुछ डालकर या चावल रखकर लाएँ।
2
धन्वंतरि पूजन
संध्या को प्रदोष काल में — सूर्यास्त के बाद के लगभग दो घंटे। धन्वंतरि, लक्ष्मी और कुबेर की एक साथ पूजा।
3
नई वस्तु का पूजन
जो ख़रीदा है उसे पूजा में रखें, तिलक करें, उसमें कुछ अन्न या जल भरें।
4
यम दीपक
पूजा के बाद आटे का चौमुखी दीपक सरसों के तेल से भरकर, काले तिल डालकर, घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण की ओर मुँह करके रखें। यह सबसे आख़िर में होता है और घर के अंदर नहीं आता।
5
धनिया
धनिये के बीज पूजा में रखें और अगले दिन गमले में बो दें।
क्या करें
- यम दीपक घर के बाहर, दक्षिण दिशा की ओर मुँह करके रखें — यह लक्ष्मी का दीपक नहीं है और अंदर नहीं आता।
- ख़रीदी हुई धातु ख़ाली न लाएँ; उसमें चावल, जल या मिठाई डालकर लाएँ।
- पूजा प्रदोष काल में करें — सूर्यास्त के बाद, दिन में नहीं।
- झाड़ू आज ख़रीदें और उस पर सफ़ेद धागा बाँधकर रखें; परंपरा में उसे लक्ष्मी मानते हैं।
- धन्वंतरि को भी उतना ही याद रखें जितना लक्ष्मी को — दिन असल में उन्हीं का है।
क्या न करें
- आज लोहा और एल्युमिनियम न ख़रीदें; धातु में चाँदी, पीतल, ताँबा या स्टील।
- धारदार चीज़ें — चाकू, कैंची — आज ख़रीदने की परंपरा नहीं है।
- आज उधार न दें और न धन बाहर भेजें।
- झाड़ू पर पैर न रखें और आज उसे किसी को दें नहीं।
- यम दीपक जलाने के बाद उसे उठाकर घर के अंदर न लाएँ, और न बुझाएँ — अपने आप बुझने दें।
- काले रंग की वस्तु और काला वस्त्र आज ख़रीदने से बचें।
आरती
श्री धन्वंतरि आरती
ॐ जय धन्वंतरि देवा, स्वामी जय धन्वंतरि देवा।
जरा-रोग से पीड़ित, जन-जन सुख देवा॥
तुम समुद्र से प्रकटे, कर में अमृत लाए।
देव-दनुज सब हारे, तुमने रोग हराए॥
आयुर्वेद प्रवर्तक, तुम विष्णु अवतारी।
औषधि रूप तुम्हारा, जग की पीड़ा हारी॥
शंख चक्र कर सोहत, जलजात सुहावन।
पीत वसन तन धारे, दर्शन मन भावन॥
जो नर नित तुम ध्यावे, रोग न ताहि सतावे।
आयु बढ़े सुख पावे, यश जग में छावे॥
श्री धन्वंतरि जी की आरती, जो कोई नर गावे।
रोग-शोक मिट जावे, निरोगी हो जावे॥
आकाश का अपना कैलेंडर है। आपका भी।
वही गणना आपके जन्म-क्षण पर — हर भाव, हर ग्रह, हर दशा तिथियों सहित।
