दीपावली कब है?
उत्तर
रविवार, 08 नवम्बर 2026
कार्तिक अमावस्या। संध्या को लक्ष्मी पूजन।
लक्ष्मी पूजन मुहूर्त
मुहूर्त
शाम 5:54 – 7:50
- अवधि
- 1 घंटे 56 मिनट
- सूर्यास्त
- शाम 5:31
- प्रदोष काल
- शाम 5:31 – 7:55
प्रदोष काल स्थानीय सूर्यास्त से छह घटिका — तीन मुहूर्त, 2 घंटे 24 मिनट — तक रहता है; यही निर्णयसिंधु और धर्मसिंधु का वचन है। ऊपर का मुहूर्त उसी का वह भाग है जिसमें स्थिर लग्न उदय हो और अमावस्या अब भी चल रही हो। स्थिर अर्थात् जो टले नहीं — और परंपरा कारण भी साफ़ कहती है: स्थिर लग्न में जिसे बुलाया जाए, वह ठहरता है।
उसी दिन क्यों
- यह कौन-सी तिथि है
- कार्तिक कृष्ण अमावस्या
यह सूर्योदय से नहीं, प्रदोष से तय होती है। तिथि उस दिन के सूर्योदय पर चल सकती है जिसकी संध्या तक वह बीत चुकी हो — और इसी से सामान्य गणना वाला कैलेंडर एक दिन पीछे रह जाता है।
उसके बाद
शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2027
कार्तिक कृष्ण अमावस्या
शाम 6:35 – 7:06
मंगलवार, 17 अक्टूबर 2028
कार्तिक कृष्ण अमावस्या
शाम 7:19 – रात 8:13
यह तिथि कैसे निकली
त्योहार एक स्थिति है, तारीख़ नहीं। चांद्र मास का नाम उस राशि से पड़ता है जिसमें सूर्य उस अमावस्या पर हो जो मास आरंभ करती है, और तिथि सूर्य से चंद्रमा की दूरी है, बारह-बारह अंश में। दोनों उसी गणना से आते हैं जिससे यह साइट कुंडली बनाती है।
उत्तर भारत मास पूर्णिमा से पूर्णिमा तक गिनता है, इसलिए कृष्ण पक्ष अगले मास का नाम लेता है — वही दिन पुणे में श्रावण कृष्ण तृतीया है और दिल्ली में भाद्रपद कृष्ण तृतीया। यहाँ उत्तर की गणना है, और तिथि ऊपर छपी है ताकि कुछ भी मानना न पड़े।
क्यों मनाई जाती है
कार्तिक अमावस्या — साल की सबसे अंधेरी रात, और इसीलिए दीपों की। राम चौदह वर्ष का वनवास पूरा कर आज अयोध्या लौटे थे और नगर ने पंक्तियों में दीप जलाए — दीप-आवली। इसी रात लक्ष्मी समुद्र मंथन से प्रकट हुई थीं, और इसी रात महावीर को निर्वाण मिला था। पूजा प्रदोष काल में होती है, और उसमें भी स्थिर लग्न ढूँढ़ा जाता है — क्योंकि परंपरा साफ़ कहती है कि स्थिर लग्न में जो बुलाया जाए वह टिकता है। यही एक बात है जो हर साल तारीख़ तय करती है: अमावस्या जिस शाम प्रदोष काल में चल रही हो, दिवाली उसी दिन है — भले अगली सुबह सूर्योदय पर भी अमावस्या हो।
कथा
लौटना
चौदह वर्ष पूरे कर राम, सीता और लक्ष्मण अयोध्या लौटे। रावण मारा जा चुका था।
अमावस्या की रात
जिस रात वे पहुँचे वह कार्तिक की अमावस्या थी — चाँद बिल्कुल नहीं।
दीपों की पंक्ति
नगरवासियों ने हर छत, हर द्वार, हर घाट पर मिट्टी के दीप पंक्तियों में जलाए ताकि रास्ता अंधेरा न रहे। उसी पंक्ति का नाम दीपावली है।
लक्ष्मी
दूसरी कथा समुद्र मंथन की है — इसी रात लक्ष्मी क्षीरसागर से निकलीं और विष्णु को वरमाला पहनाई। इसीलिए आज उनका आवाहन होता है।
बलि और वामन
तीसरी कथा में विष्णु ने वामन रूप में बलि से तीन पग भूमि माँगी और उसे पाताल भेजा — पर वर दिया कि वर्ष में ये दिन उसके नाम रहेंगे। इसीलिए दक्षिण और महाराष्ट्र में यह बलि प्रतिपदा से जुड़ा है।
सामग्री
- लक्ष्मी और गणेश की नई मूर्तियाँ — लक्ष्मी बैठी हुई, गणेश उनकी बाईं ओर
- मिट्टी के दीये और सरसों का तेल; एक बड़ा दीपक घी का
- कमल का फूल, गेंदा, बताशे, खील
- चाँदी का सिक्का, कौड़ियाँ, कमलगट्टा
- बही-खाता या नई पुस्तक, नई कलम — कलम पूजन के लिए
- रोली, अक्षत, कलावा, पान, सुपारी, लौंग, इलायची
- पंचामृत, गंगाजल, कलश
- मिठाई — विशेषकर बताशे, और नारियल
- झाड़ू, यदि धनतेरस पर न ली हो
पूजा विधि
1
सफ़ाई और रंगोली
दिन में घर की सफ़ाई पूरी करें और द्वार पर रंगोली तथा आम-अशोक का तोरण लगाएँ। लक्ष्मी अस्वच्छ घर में नहीं आतीं — यह कहावत नहीं, इसी दिन का नियम है।
2
समय
पूजा प्रदोष काल में, और उसके भीतर स्थिर लग्न में। अधिकांश उत्तर भारत में यह वृषभ लग्न होता है — पंचांग से समय लेकर ही बैठें।
3
स्थापना
पूर्व या उत्तर दिशा में चौकी, लाल वस्त्र, उस पर गणेश दाहिने-लक्ष्मी बाएँ की परंपरा के अनुसार स्थापना। सामने कलश।
4
षोडशोपचार
आवाहन, आसन, स्नान, वस्त्र, आभूषण, गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य — सोलह उपचार क्रम से।
5
कुबेर और कलम पूजन
तिजोरी या गल्ले पर कुबेर का पूजन; बही-खाते और कलम पर स्वस्तिक बनाकर पूजा। व्यापारी यहीं नया वर्ष शुरू करते हैं।
6
दीपदान
पूजा के बाद घर के हर कोने, द्वार, छत, तुलसी और जल-स्थान पर दीप रखें। मुख्य द्वार पर दो दीप अवश्य।
7
आरती और प्रसाद
गणेश की आरती पहले, फिर लक्ष्मी की। खील-बताशे का प्रसाद बाँटें और रात में एक दीप जलता छोड़ दें।
क्या करें
- पूजा प्रदोष काल के स्थिर लग्न में करें। तारीख़ भी इसी नियम से तय होती है — अमावस्या जिस शाम प्रदोष में हो, दिवाली उसी दिन।
- मुख्य द्वार पर दीप ज़रूर रखें और रात भर एक दीप जलता छोड़ें।
- मूर्ति में लक्ष्मी बैठी हुई लें, खड़ी नहीं — बैठी लक्ष्मी ठहरने की प्रतीक मानी जाती है।
- गणेश और लक्ष्मी की मूर्ति हर साल नई लें; पुरानी को जल में प्रवाहित करें या पेड़ के नीचे रखें।
- बही-खाता और कलम की पूजा करें — व्यापार का वर्ष यहीं से गिना जाता है।
- सफ़ाई पूजा से पहले पूरी हो जानी चाहिए, बाद में नहीं।
क्या न करें
- पूजा के दिन घर में झाड़ू रात को न लगाएँ और कूड़ा बाहर न फेंकें — लक्ष्मी को बाहर भेजना माना जाता है।
- आज किसी को उधार न दें और न धन बाहर भेजें।
- लक्ष्मी पूजन में लोहे के बर्तन और काले वस्त्र न रखें।
- पूजा के बाद दीपक बुझाएँ नहीं — तेल ख़त्म होने दें।
- जुआ, मदिरा और माँस — तीनों इस रात परंपरा में वर्जित हैं, चाहे रिवाज़ जो भी बन गया हो।
- टूटी या खंडित मूर्ति की पूजा न करें, और गणेश की सूँड की दिशा देखकर ही मूर्ति लें।
आरती
ॐ जय लक्ष्मी माता
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निशिदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता॥
उमा रमा ब्रह्माणी, तुम ही जग माता।
सूर्य चंद्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥
दुर्गा रूप निरंजनि, सुख सम्पत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि सिद्धि धन पाता॥
तुम पाताल निवासिनि, तुम ही शुभदाता।
कर्म प्रभाव प्रकाशिनि, भवनिधि की त्राता॥
जिस घर तुम रहती हो, ताँहि में हैं सद्गुण आता।
सब सम्भव हो जाता, मन नहीं घबराता॥
तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता।
खान पान का वैभव, सब तुमसे आता॥
शुभ गुण मंदिर सुंदर, क्षीरोदधि जाता।
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥
महालक्ष्मी जी की आरती, जो कोई नर गाता।
उर आनंद समाता, पाप उतर जाता॥
आकाश का अपना कैलेंडर है। आपका भी।
वही गणना आपके जन्म-क्षण पर — हर भाव, हर ग्रह, हर दशा तिथियों सहित।
