दुर्गा अष्टमी कब है?
उत्तर
सोमवार, 19 अक्टूबर 2026
नवरात्रि की अष्टमी।
उसी दिन क्यों
- यह कौन-सी तिथि है
- आश्विन शुक्ल 8
सामान्य नियम से: वह दिन जिसके सूर्योदय पर यह तिथि चल रही हो।
उसके बाद
गुरुवार, 07 अक्टूबर 2027
आश्विन शुक्ल 8
मंगलवार, 26 सितम्बर 2028
आश्विन शुक्ल 8
यह तिथि कैसे निकली
त्योहार एक स्थिति है, तारीख़ नहीं। चांद्र मास का नाम उस राशि से पड़ता है जिसमें सूर्य उस अमावस्या पर हो जो मास आरंभ करती है, और तिथि सूर्य से चंद्रमा की दूरी है, बारह-बारह अंश में। दोनों उसी गणना से आते हैं जिससे यह साइट कुंडली बनाती है।
उत्तर भारत मास पूर्णिमा से पूर्णिमा तक गिनता है, इसलिए कृष्ण पक्ष अगले मास का नाम लेता है — वही दिन पुणे में श्रावण कृष्ण तृतीया है और दिल्ली में भाद्रपद कृष्ण तृतीया। यहाँ उत्तर की गणना है, और तिथि ऊपर छपी है ताकि कुछ भी मानना न पड़े।
क्यों मनाई जाती है
नवरात्रि की आठवीं तिथि, जिसे महाअष्टमी कहते हैं। अष्टमी का अपना कारण है: देवी महात्म्य के अनुसार इसी दिन दुर्गा के क्रोध से काली प्रकट हुईं और उन्होंने चंड और मुंड का वध किया — इसी से उनका नाम चामुंडा पड़ा। अष्टमी और नवमी के जोड़ के 48 मिनट को संधि काल कहते हैं; वही वह क्षण है और वही सबसे तेज़ पूजा का समय माना जाता है। महागौरी इस दिन की देवी हैं।
कथा
दो सेनापति
शुम्भ-निशुम्भ ने चंड और मुंड को देवी को पकड़ लाने भेजा। वे भारी सेना लेकर आए।
काली का प्रकट होना
देवी ने उन्हें देखा और क्रोध से उनका मुख काला पड़ गया। उसी भृकुटि से काली निकलीं — कृश, विकराल, बाघ की खाल पहने, खप्पर लिए।
वध
काली ने सेना को निगल लिया और चंड-मुंड के सिर काटकर दुर्गा को सौंप दिए।
चामुंडा
दुर्गा ने कहा — तुमने चंड और मुंड को मारा है, इसलिए संसार तुम्हें चामुंडा कहेगा। महाअष्टमी उसी दिन की स्मृति है।
महागौरी
इसी तिथि का दूसरा रूप महागौरी है — वही काली जिन्होंने कठोर तप के बाद गंगाजल से स्नान किया और उज्ज्वल हो गईं। एक ही देवी के दो छोर, एक ही दिन।
सामग्री
- नारियल, लाल चुनरी और लाल चूड़ियाँ
- श्रृंगार का सामान — सिंदूर, बिंदी, काजल, मेहँदी
- हलवा, पूरी और काला चना — कन्या भोजन का निश्चित भोग
- नारियल का भोग (महागौरी को प्रिय)
- 108 दीपक अथवा एक बड़ा घी का दीपक, संधि पूजा के लिए
- लाल गुड़हल के फूल और बेलपत्र
- धूप, कपूर, अगरबत्ती
- कन्याओं के लिए दक्षिणा और कोई भेंट
- अष्टमी हवन के लिए आम की लकड़ी, हवन सामग्री, काले तिल
पूजा विधि
1
स्नान और संकल्प
प्रातः स्नान करके लाल या पीले वस्त्र। जिसने नवरात्रि का व्रत रखा है, उसका आज पारण नहीं — नवमी को है।
2
महागौरी पूजन
षोडशोपचार पूजा, नारियल का भोग, गुड़हल के फूल, दुर्गा सप्तशती के मध्यम चरित्र का पाठ।
3
संधि पूजा
अष्टमी के अंतिम 24 मिनट और नवमी के पहले 24 मिनट। इसी में 108 दीपक जलाए जाते हैं। यह समय पंचांग से देखकर ही तय करें — यह घड़ी का नहीं, तिथि का समय है।
4
हवन
जो हवन करते हैं वे संधि काल के बाद करें — दुर्गा सप्तशती के मंत्रों से 108 आहुति।
5
कन्या पूजन
नौ कन्याएँ और एक बालक। पैर धोएँ, तिलक करें, कलावा बाँधें, फिर हलवा-पूरी-चना। भोजन के बाद दक्षिणा और चरण स्पर्श।
6
आरती
अंत में आरती और क्षमा प्रार्थना।
क्या करें
- संधि पूजा का समय पंचांग से लें। यह अष्टमी के अंत के 24 मिनट + नवमी के आरंभ के 24 मिनट हैं — हर साल, हर शहर में अलग।
- कन्या भोजन अष्टमी या नवमी, एक ही दिन। परिवार की परंपरा जो हो वही रखें।
- कन्याओं की संख्या नौ न जुटे तो जितनी हों उतनी — परंपरा में कम पर मना नहीं है, पर बुलाकर लौटाना मना है।
- व्रत का पारण नवमी को है; अष्टमी को नहीं।
- हवन में आहुति के बाद पूर्णाहुति ज़रूरी है — नारियल और सुपारी के साथ।
क्या न करें
- संधि काल में पूजा बीच में न छोड़ें और उस समय भोजन न करें।
- आज गैर-सात्विक भोजन, प्याज़-लहसुन और मदिरा घर में नहीं।
- कन्याओं को जूठा या बासी भोजन न दें, और उनसे बर्तन न उठवाएँ।
- काले वस्त्र पहनकर पूजा न करें।
- अष्टमी को व्रत तोड़ने की जल्दी न करें — कई घर आज ही तोड़ देते हैं, जो नियम नहीं है।
आरती
अम्बे तू है जगदम्बे काली
अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली।
तेरे ही गुण गाएँ भारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती॥
तेरे भक्त जनों पर माता, भीर पड़ी है भारी।
दानव दल पर टूट पड़ो माँ, करके सिंह सवारी॥
सौ-सौ सिंहों से तू बलशाली, दस भुजाओं वाली।
दुखियों के दुखड़े निवारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती॥
माँ बेटे का है इस जग में, बड़ा ही निर्मल नाता।
पूत कपूत सुने हैं पर ना, माता सुनी कुमाता॥
सब पे करुणा दरसाने वाली, अमृत बरसाने वाली।
दुखियों के दुखड़े निवारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती॥
आकाश का अपना कैलेंडर है। आपका भी।
वही गणना आपके जन्म-क्षण पर — हर भाव, हर ग्रह, हर दशा तिथियों सहित।
