दशहरा / विजयादशमी कब है?
उत्तर
बुधवार, 21 अक्टूबर 2026
दशमी। रावण दहन।
उसी दिन क्यों
- यह कौन-सी तिथि है
- आश्विन शुक्ल 10
सामान्य नियम से: वह दिन जिसके सूर्योदय पर यह तिथि चल रही हो।
उसके बाद
रविवार, 10 अक्टूबर 2027
आश्विन शुक्ल 10
गुरुवार, 28 सितम्बर 2028
आश्विन शुक्ल 10
यह तिथि कैसे निकली
त्योहार एक स्थिति है, तारीख़ नहीं। चांद्र मास का नाम उस राशि से पड़ता है जिसमें सूर्य उस अमावस्या पर हो जो मास आरंभ करती है, और तिथि सूर्य से चंद्रमा की दूरी है, बारह-बारह अंश में। दोनों उसी गणना से आते हैं जिससे यह साइट कुंडली बनाती है।
उत्तर भारत मास पूर्णिमा से पूर्णिमा तक गिनता है, इसलिए कृष्ण पक्ष अगले मास का नाम लेता है — वही दिन पुणे में श्रावण कृष्ण तृतीया है और दिल्ली में भाद्रपद कृष्ण तृतीया। यहाँ उत्तर की गणना है, और तिथि ऊपर छपी है ताकि कुछ भी मानना न पड़े।
क्यों मनाई जाती है
आश्विन शुक्ल दशमी — एक ही दिन में दो जीतें। उत्तर भारत में यह वह दिन है जब राम ने रावण को मारा; बंगाल और पूर्व में यह वह दिन है जब दुर्गा ने महिषासुर का वध किया और नौ रात का युद्ध पूरा हुआ। इसीलिए इसके दो नाम हैं — दशहरा (दस सिरों का हरण) और विजयादशमी। परंपरा में यह वर्ष के तीन ‘अबूझ मुहूर्त’ में से एक है: इस दिन कोई भी नया काम बिना मुहूर्त देखे शुरू किया जा सकता है — यही कारण है कि बच्चों की अक्षर-आरंभ, नया वाहन, नई दुकान आज ही होती है।
कथा
सीता हरण
रावण सीता को हर ले गया। राम ने वानर सेना के साथ समुद्र पर सेतु बाँधा और लंका पहुँचे।
नौ दिन
युद्ध चलता रहा। कुंभकर्ण गिरा, मेघनाद गिरा, पर रावण नहीं गिरता था — हर बार सिर काटो तो नया उग आता।
विभीषण की बात
विभीषण ने बताया कि रावण की नाभि में अमृत है। सिर काटने से वह नहीं मरेगा।
अंत
राम ने अगस्त्य के दिए ब्रह्मास्त्र से नाभि पर प्रहार किया और रावण गिरा। वही दशमी है।
दूसरी कथा
इसी तिथि को अर्जुन ने अज्ञातवास पूरा कर शमी वृक्ष से अपने अस्त्र उतारे और अकेले कौरव सेना को हराया। इसीलिए आज शमी के पत्ते बाँटे जाते हैं — ‘सोना’ कहकर।
सामग्री
- शमी के पत्ते (या आपटा) — बाँटने के लिए
- गेंदे के फूल और अशोक के पत्ते
- रोली, अक्षत, नारियल
- गुड़ और गुड़ की जलेबी — दशहरे का पारंपरिक भोग
- नए वाहन/औज़ार/पुस्तक की पूजा के लिए कलावा और नींबू
- शस्त्र पूजा के लिए घर के औज़ार, वाहन की चाबी, कलम या तराज़ू — जो जिसकी आजीविका हो
- दही और चावल — तिलक के लिए
- धूप, दीप, कपूर
पूजा विधि
1
अपराह्न का समय
विजय मुहूर्त दिन का ग्यारहवाँ मुहूर्त है — अपराह्न में, लगभग 45 मिनट। दशहरे का हर काम इसी में होता है, सुबह नहीं।
2
शस्त्र पूजा
जिस चीज़ से घर चलता है उसे साफ़ करके सामने रखें — औज़ार, वाहन, कलम, बही, तराज़ू। हल्दी-रोली से तिलक, अक्षत, फूल, फिर नारियल।
3
अपराजिता पूजन
उत्तर-पूर्व कोने में अष्टदल कमल बनाकर अपराजिता देवी का आवाहन — ‘जिसे हराया न जा सके’। यही दशहरे की मूल पूजा है।
4
शमी पूजन
शमी वृक्ष की परिक्रमा और पत्ते तोड़कर लाना। घर लौटकर बड़ों को पत्ता देकर चरण स्पर्श।
5
रावण दहन
संध्या को, सूर्यास्त के बाद। दहन के बाद लौटते समय शमी/आपटा के पत्ते बाँटे जाते हैं।
6
नया आरंभ
अबूझ मुहूर्त है — नई दुकान, नया वाहन, बच्चे की विद्यारंभ, नया काम आज बिना मुहूर्त देखे शुरू किया जा सकता है।
क्या करें
- पूजा अपराह्न के विजय मुहूर्त में करें, सुबह नहीं। दशहरे की यह सबसे ज़्यादा भूली जाने वाली बात है।
- शमी के पत्ते बड़ों को देकर चरण स्पर्श करें — यही दिन का असली रिवाज़ है, मिठाई नहीं।
- नया काम, नया वाहन, नई दुकान आज शुरू कर सकते हैं — अबूझ मुहूर्त में मुहूर्त देखने की ज़रूरत नहीं।
- जो औज़ार आपकी आजीविका है, उसकी ही पूजा करें — दर्ज़ी की कैंची, ड्राइवर की गाड़ी, विद्यार्थी की क़लम।
- रावण दहन देखने जाएँ तो लौटते समय शमी/आपटा साथ लाएँ; घर की तिजोरी या पूजा स्थान में रखें।
क्या न करें
- शमी और आपटा के पेड़ की टहनी न तोड़ें — केवल पत्ते लें।
- आज किसी का अपमान न करें और उधार न दें; परंपरा में विजय के दिन घर से धन बाहर नहीं जाता।
- रावण दहन के बाद जली लकड़ी घर न लाएँ — पत्ते लाए जाते हैं, राख नहीं।
- शस्त्र पूजा में औज़ार गंदा या टूटा न रखें; पहले साफ़ करें, फिर पूजा।
- नवरात्रि का व्रत आज तक न खींचें — पारण नवमी को हो चुका होता है।
आरती
श्री रामचंद्र कृपालु भजमन
श्री रामचंद्र कृपालु भजमन हरण भव भय दारुणम्।
नव कंज लोचन कंज मुख कर कंज पद कंजारुणम्॥
कंदर्प अगणित अमित छवि नव नील नीरज सुंदरम्।
पटपीत मानहुँ तड़ित रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरम्॥
भजु दीनबंधु दिनेश दानव दैत्यवंश निकंदनम्।
रघुनंद आनंदकंद कोशल चंद दशरथ नंदनम्॥
सिर मुकुट कुंडल तिलक चारु उदार अंग विभूषणम्।
आजानुभुज शर चापधर संग्राम जित खरदूषणम्॥
इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रंजनम्।
मम हृदय कंज निवास कुरु कामादि खलदल गंजनम्॥
आकाश का अपना कैलेंडर है। आपका भी।
वही गणना आपके जन्म-क्षण पर — हर भाव, हर ग्रह, हर दशा तिथियों सहित।
