गणेश चतुर्थी कब है?
उत्तर
शनिवार, 04 सितम्बर 2027
गणपति स्थापना, एक से दस दिन।
मध्याह्न काल पूजा मुहूर्त
मुहूर्त
सुबह 11:04 – दोपहर 12:26
- अवधि
- 1 घंटे 22 मिनट
- सूर्यास्त
- शाम 6:39
- मध्याह्न काल
- सुबह 11:04 – दोपहर 1:36
मध्याह्न काल उन्हीं पाँच भागों में बीच का है — सूर्योदय से सूर्यास्त तक को पाँच में बाँटकर तीसरा। यह घड़ी का दोपहर बारह बजे नहीं है। मान्यता है कि गणेश जी का जन्म इसी काल में हुआ, इसलिए स्थापना इसी में होती है — और तारीख़ भी सूर्योदय से नहीं, इसी से तय होती है कि चतुर्थी किस दिन मध्याह्न को ढँकती है। ऊपर दी गई खिड़की उसी हिस्से की है जहाँ तिथि सचमुच चल रही है।
उसी दिन क्यों
- यह कौन-सी तिथि है
- भाद्रपद शुक्ल 4
यह सूर्योदय से नहीं, मध्याह्न से तय होती है। तिथि को दिन के मध्य को ढँकना चाहिए — मान्यता है कि गणेश जी का जन्म उसी काल में हुआ — और सामान्य गणना वाला कैलेंडर तब एक दिन आगे चला जाता है जब तिथि भोर में तो है पर दोपहर तक बीत चुकी होती है।
उसके बाद
बुधवार, 23 अगस्त 2028
भाद्रपद शुक्ल 4
सुबह 11:05 – दोपहर 1:41
मंगलवार, 11 सितम्बर 2029
भाद्रपद शुक्ल 4
सुबह 11:02 – दोपहर 1:32
यह तिथि कैसे निकली
त्योहार एक स्थिति है, तारीख़ नहीं। चांद्र मास का नाम उस राशि से पड़ता है जिसमें सूर्य उस अमावस्या पर हो जो मास आरंभ करती है, और तिथि सूर्य से चंद्रमा की दूरी है, बारह-बारह अंश में। दोनों उसी गणना से आते हैं जिससे यह साइट कुंडली बनाती है।
उत्तर भारत मास पूर्णिमा से पूर्णिमा तक गिनता है, इसलिए कृष्ण पक्ष अगले मास का नाम लेता है — वही दिन पुणे में श्रावण कृष्ण तृतीया है और दिल्ली में भाद्रपद कृष्ण तृतीया। यहाँ उत्तर की गणना है, और तिथि ऊपर छपी है ताकि कुछ भी मानना न पड़े।
क्यों मनाई जाती है
गणेश चतुर्थी गणेश जी के जन्म का दिन है। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को, मध्याह्न काल में — इसीलिए इस त्योहार की तारीख़ सूर्योदय से नहीं, दोपहर से तय होती है। घर में मिट्टी की मूर्ति बिठाई जाती है, डेढ़ से दस दिन उनकी सेवा होती है, और अनंत चतुर्दशी को जल में विसर्जन। मूर्ति मिट्टी की इसलिए कि वह लौटकर उसी में मिल जाए — आना और जाना, दोनों इसी त्योहार का हिस्सा हैं।
कथा
जन्म
पार्वती ने स्नान से पहले अपने उबटन से एक बालक बनाया और उसमें प्राण डाले। उसे कहा — द्वार पर बैठो, किसी को भीतर मत आने देना। बालक ने वही किया। शिव लौटे, बालक ने रोका, और न पहचानने पर उसका सिर धड़ से अलग हो गया।
हाथी का सिर
पार्वती के क्रोध के आगे शिव ने कहा — उत्तर दिशा में जो पहला जीव मिले, उसका सिर ले आओ। गण एक हाथी का सिर लाए, वही जोड़ा गया, और बालक फिर जीवित हुआ। तब से वे गजानन हैं।
पहले पूजा क्यों
शिव ने वरदान दिया कि किसी भी कार्य में पहली पूजा गणेश की होगी। इसीलिए विवाह हो या गृह-प्रवेश, नया काम हो या नया बही-खाता — शुरुआत उन्हीं से।
मोदक और दूर्वा
मोदक भीतर से मीठा और बाहर से सादा है — फल भीतर होता है, दिखावे में नहीं। दूर्वा वह घास है जो कहीं भी उग आती है; चढ़ावे में सबसे सस्ती चीज़ सबसे प्रिय है, यह अपने आप में एक बात है।
चाँद न देखने की बात
इस दिन चाँद देखने पर झूठा दोष लगने की कथा है — चंद्रमा ने गणेश जी के रूप पर हँसा था। कृष्ण पर स्यमंतक मणि चुराने का आरोप इसी दिन चाँद देखने से लगा, ऐसा कहा जाता है। जिसने देख लिया हो, वह यही कथा सुन ले — उपाय भी यही है।
सामग्री
- मिट्टी की गणेश प्रतिमा
- चौकी और लाल या पीला कपड़ा
- कलश, नारियल, आम के पत्ते
- जनेऊ, मौली, रोली, अक्षत (साबुत चावल)
- दूर्वा — 21 गाँठ
- लाल फूल, विशेषकर गुड़हल
- मोदक या लड्डू
- पंचामृत — दूध, दही, घी, शहद, शक्कर
- धूप, दीपक, कपूर, अगरबत्ती
- पान, सुपारी, इलायची, लौंग
- फल और मिठाई
- गंगाजल
पूजा विधि
1
स्नान और संकल्प
स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। पूजा-स्थान पूर्व या उत्तर-पूर्व में रखें। हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प लें — कितने दिन बिठाना है, यह इसी समय तय करें।
2
चौकी और स्थापना
चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएँ, अक्षत की छोटी ढेरी रखें, उस पर प्रतिमा। मुख पूर्व या पश्चिम की ओर हो। यह काम मध्याह्न मुहूर्त में करें — ऊपर दी गई खिड़की उसी की है।
3
प्राण-प्रतिष्ठा
प्रतिमा पर दूर्वा से गंगाजल छिड़कें और मंत्र के साथ आवाहन करें — ॐ गं गणपतये नमः। यही वह क्षण है जब मूर्ति अतिथि बन जाती है।
4
षोडशोपचार पूजा
क्रम से — आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, पंचामृत स्नान, वस्त्र, जनेऊ, चंदन, अक्षत, फूल, दूर्वा, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल।
5
दूर्वा और मोदक
21 गाँठ दूर्वा चढ़ाएँ, फिर मोदक या लड्डू का भोग। भोग के बाद जल अर्पित करें।
6
आरती और क्षमा
कपूर से आरती करें, तीन परिक्रमा, और अंत में क्षमा-प्रार्थना — पूजा में जो रह गया हो, उसके लिए।
7
रोज़ की सेवा
जितने दिन बिठाया है, दोनों समय भोग और आरती। विसर्जन के दिन दही-चावल का भोग, फिर जल में विसर्जन।
क्या करें
- स्थापना मध्याह्न काल में — ऊपर दी गई खिड़की में। गणेश जी का जन्म इसी काल में माना जाता है।
- दूर्वा 21 गाँठ में चढ़ाएँ। दूर्वा के बिना गणेश पूजा अधूरी मानी जाती है।
- जितने दिन का संकल्प लिया है, उतने दिन दोनों समय भोग और आरती — बीच में छोड़ना नहीं।
- विसर्जन ऐसे जल में जो बहता हो या जहाँ मिट्टी घुल जाए। प्रतिमा मिट्टी की इसीलिए ली जाती है।
क्या न करें
- तुलसी न चढ़ाएँ। गणेश जी एकमात्र देवता हैं जिन पर तुलसी वर्जित है — कथा के अनुसार तुलसी ने उन्हें विवाह के लिए कहा, उन्होंने मना किया, और दोनों ने एक-दूसरे को श्राप दिया।
- चतुर्थी की रात चंद्रमा न देखें। इसी रात चंद्रमा ने उन पर हँसकर श्राप पाया था; देखने पर मिथ्या कलंक लगने की मान्यता है।
- प्लास्टर ऑफ़ पेरिस की प्रतिमा न लें — वह जल में घुलती नहीं, और विसर्जन का पूरा अर्थ खो देती है।
- खंडित या टूटी प्रतिमा स्थापित न करें।
आरती
जय गणेश जय गणेश देवा
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥
एक दंत दयावंत चार भुजा धारी।
माथे सिंदूर सोहे मूसे की सवारी॥
अंधन को आँख देत कोढ़िन को काया।
बाँझन को पुत्र देत निर्धन को माया॥
पान चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे संत करें सेवा॥
दीनन की लाज रखो शंभु सुतवारी।
कामना को पूर्ण करो जग बलिहारी॥
आकाश का अपना कैलेंडर है। आपका भी।
वही गणना आपके जन्म-क्षण पर — हर भाव, हर ग्रह, हर दशा तिथियों सहित।
