गुरु पूर्णिमा कब है?
उत्तर
रविवार, 18 जुलाई 2027
गुरु के लिए रखी पूर्णिमा।
उसी दिन क्यों
- यह कौन-सी तिथि है
- आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा
सामान्य नियम से: वह दिन जिसके सूर्योदय पर यह तिथि चल रही हो।
उसके बाद
गुरुवार, 06 जुलाई 2028
आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा
बुधवार, 25 जुलाई 2029
आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा
यह तिथि कैसे निकली
त्योहार एक स्थिति है, तारीख़ नहीं। चांद्र मास का नाम उस राशि से पड़ता है जिसमें सूर्य उस अमावस्या पर हो जो मास आरंभ करती है, और तिथि सूर्य से चंद्रमा की दूरी है, बारह-बारह अंश में। दोनों उसी गणना से आते हैं जिससे यह साइट कुंडली बनाती है।
उत्तर भारत मास पूर्णिमा से पूर्णिमा तक गिनता है, इसलिए कृष्ण पक्ष अगले मास का नाम लेता है — वही दिन पुणे में श्रावण कृष्ण तृतीया है और दिल्ली में भाद्रपद कृष्ण तृतीया। यहाँ उत्तर की गणना है, और तिथि ऊपर छपी है ताकि कुछ भी मानना न पड़े।
क्यों मनाई जाती है
आषाढ़ की पूर्णिमा — वेदव्यास का जन्मदिन, और इसीलिए इसका असली नाम व्यास पूर्णिमा है। व्यास ने एक वेद को चार भागों में बाँटा, महाभारत लिखी और अठारह पुराण रचे; परंपरा उन्हें आदि गुरु मानती है — पहला व्यक्ति जिसने ज्ञान को व्यवस्थित करके आगे सौंपा। बौद्ध परंपरा में यही वह दिन है जब बुद्ध ने सारनाथ में पहला उपदेश दिया। यह चातुर्मास का दूसरा दिन भी है, और यहीं से संन्यासियों का चार महीने का प्रवास शुरू होता है।
कथा
व्यास का जन्म
पराशर और सत्यवती के पुत्र कृष्ण द्वैपायन — साँवले, और द्वीप पर जन्मे, इसीलिए यह नाम। वे जन्म के तुरंत बाद तप के लिए चले गए।
वेद का विभाजन
कलियुग आते देख उन्होंने एक विशाल वेद को चार भागों में बाँटा — ऋग्, यजुर्, साम, अथर्व — ताकि सामान्य स्मृति उसे संभाल सके। इसी से नाम पड़ा वेदव्यास।
महाभारत
उन्होंने महाभारत रची और गणेश ने उसे लिखा — इस शर्त पर कि कलम रुके नहीं, और व्यास की शर्त थी कि गणेश बिना समझे न लिखें।
पहला उपदेश
दूसरी परंपरा में यही वह दिन है जब बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद सारनाथ में पाँच शिष्यों को पहला उपदेश दिया — धर्मचक्र प्रवर्तन।
गुरु का अर्थ
गु का अर्थ अंधकार, रु का अर्थ हटाने वाला। दिन उसी क्रिया का है, व्यक्ति का नहीं।
सामग्री
- गुरु की तस्वीर या पादुका
- पीले फूल, पीला वस्त्र और पीली मिठाई
- नारियल, फल और दक्षिणा
- व्यास जी का चित्र — व्यास पूजा के लिए
- चंदन, अक्षत, रोली, कलावा
- घी का दीपक और धूप
- अपनी पुस्तक या जिस विद्या के आप विद्यार्थी हैं उसका प्रतीक
- गुरु गीता या गुरु स्तोत्र की पुस्तक
पूजा विधि
1
स्नान और संकल्प
प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र। परंपरा में पहले व्यास जी की पूजा होती है, फिर अपने गुरु की — इसीलिए इसे व्यास पूजा कहते हैं।
2
व्यास पूजन
चौकी पर सफ़ेद वस्त्र, उस पर व्यास जी का चित्र। चंदन, अक्षत, पीले फूल, धूप-दीप।
3
गुरु पूजन
गुरु उपस्थित हों तो चरण धोकर, तिलक कर, माला पहनाकर दक्षिणा दें। न हों तो उनकी तस्वीर या पादुका के सामने वही करें।
4
गुरु मंत्र
‘गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः’ का पाठ, फिर गुरु गीता या गुरु स्तोत्र।
5
दान और सेवा
अन्न, वस्त्र या पुस्तक का दान। परंपरा में आज विद्यार्थी को पढ़ाना और शिक्षक की सेवा दोनों गिने जाते हैं।
6
संकल्प
आज कुछ एक सीखने का संकल्प लिया जाता है — यही दक्षिणा का असली रूप माना गया है।
क्या करें
- पहले व्यास जी की पूजा करें, फिर अपने गुरु की — दिन का नाम ही व्यास पूर्णिमा है।
- गुरु केवल दीक्षा देने वाला ही नहीं; जिसने आपको कुछ सिखाया हो — शिक्षक, माता-पिता, कोई भी — आज उन्हें याद करना इसी दिन का भाव है।
- दक्षिणा सामर्थ्य के अनुसार दें, पर ख़ाली हाथ न जाएँ; परंपरा में गुरु के सामने ख़ाली हाथ नहीं जाते।
- आज एक चीज़ सीखने या पढ़ने का संकल्प लें — यही असली दक्षिणा मानी गई है।
- चातुर्मास आरंभ हो चुका है; आज से चार महीने का कोई नियम लेना इसी दिन से जुड़ा है।
क्या न करें
- गुरु के विषय में कटु या तुलनात्मक बात आज न करें।
- आज माँस, मदिरा और तामसिक भोजन नहीं।
- गुरु की तस्वीर या पादुका को पैर न लगे; पुस्तक पर भी नहीं।
- पूर्णिमा के दिन बाल-नाखून न कटवाएँ।
- दक्षिणा को मोल-भाव या दिखावा न बनाएँ — परंपरा में यह दोष माना जाता है।
आरती
गुरु वंदना
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥
अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः॥
अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः॥
स्थावरं जंगमं व्याप्तं यत्किंचित्सचराचरम्।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः॥
जय गुरुदेव हरे, स्वामी जय गुरुदेव हरे।
अज्ञान अंधकार को, तुम ही दूर करे॥
व्यास रूप में आए, वेद चार किए।
ज्ञान की धारा बाँटी, जग उपकार किए॥
गुरु की आरती जो नर गावे, ज्ञान का दीप जलावे।
मन का तम मिट जावे, सद्गति को पावे॥
आकाश का अपना कैलेंडर है। आपका भी।
वही गणना आपके जन्म-क्षण पर — हर भाव, हर ग्रह, हर दशा तिथियों सहित।
