हनुमान जयंती कब है?

उत्तर

मंगलवार, 20 अप्रैल 2027

चैत्र की पूर्णिमा।

उसी दिन क्यों

यह कौन-सी तिथि है
चैत्र शुक्ल पूर्णिमा

सामान्य नियम से: वह दिन जिसके सूर्योदय पर यह तिथि चल रही हो।

उसके बाद

  • रविवार, 09 अप्रैल 2028

    चैत्र शुक्ल पूर्णिमा

  • शुक्रवार, 30 मार्च 2029

    चैत्र शुक्ल पूर्णिमा

यह तिथि कैसे निकली

त्योहार एक स्थिति है, तारीख़ नहीं। चांद्र मास का नाम उस राशि से पड़ता है जिसमें सूर्य उस अमावस्या पर हो जो मास आरंभ करती है, और तिथि सूर्य से चंद्रमा की दूरी है, बारह-बारह अंश में। दोनों उसी गणना से आते हैं जिससे यह साइट कुंडली बनाती है।

उत्तर भारत मास पूर्णिमा से पूर्णिमा तक गिनता है, इसलिए कृष्ण पक्ष अगले मास का नाम लेता है — वही दिन पुणे में श्रावण कृष्ण तृतीया है और दिल्ली में भाद्रपद कृष्ण तृतीया। यहाँ उत्तर की गणना है, और तिथि ऊपर छपी है ताकि कुछ भी मानना न पड़े।

क्यों मनाई जाती है

चैत्र पूर्णिमा — हनुमान का जन्मदिन, और उत्तर भारत में यही मुख्य तिथि है। दक्षिण और कुछ प्रदेशों में यह अलग दिन मनाया जाता है, जो कोई विरोध नहीं: कुछ परंपराएँ इसे जन्म दिवस मानती हैं, कुछ विजय अभिनंदन महोत्सव। हनुमान आठ चिरंजीवियों में हैं — जिनकी मृत्यु नहीं हुई — इसलिए परंपरा में यह पुण्यतिथि नहीं, केवल जन्मोत्सव है। मंगलवार और शनिवार उनके दिन हैं, और जब जयंती इन्हीं में से किसी दिन पड़े तो उसे विशेष माना जाता है।

कथा

अंजनी का तप

अंजना शापवश वानरी रूप में थीं। पुत्र के लिए उन्होंने वर्षों तप किया।

खीर का भाग

उसी समय अयोध्या में पुत्रकामेष्टि यज्ञ हो रहा था। एक चील खीर का एक अंश उठा ले गई और वह अंजना के हाथों में गिरा — वायुदेव ने उसे वहाँ पहुँचाया।

जन्म

उस खीर से हनुमान का जन्म हुआ। इसीलिए वे वायुपुत्र भी हैं और राम के जन्म से उनका जन्म जुड़ा हुआ भी।

सूर्य को फल समझना

बालपन में उन्होंने उगते सूर्य को फल समझकर पकड़ने के लिए छलाँग लगाई। इंद्र ने वज्र मारा, ठुड्डी टूटी — ‘हनु’ से नाम हनुमान पड़ा।

शक्ति का भूलना

क्रोधित वायु ने प्राण रोक लिए; देवताओं ने मनाकर वर दिए, पर साथ ही श्राप-सा यह भी कि वे अपनी शक्ति भूल जाएँगे और किसी के याद दिलाने पर ही जागेगी। समुद्र लाँघने से पहले जाम्बवंत ने यही याद दिलाया था।

सामग्री

  • सिंदूर और चमेली का तेल — हनुमान को चोला चढ़ाने के लिए
  • लाल लंगोट और लाल वस्त्र
  • बूँदी के लड्डू, गुड़-चना और केला
  • पान का बीड़ा — परंपरा में विशेष माना जाता है
  • लाल फूल, विशेषकर गुड़हल
  • बजरंग बाण, हनुमान चालीसा और सुंदरकांड की पुस्तक
  • घी या चमेली के तेल का दीपक
  • तुलसी दल — राम भक्त होने के कारण

पूजा विधि

  1. 1

    ब्रह्म मुहूर्त

    परंपरा में हनुमान का जन्म सूर्योदय के समय माना जाता है, इसलिए पूजा प्रातः जल्दी होती है। स्नान कर लाल या पीले वस्त्र।

  2. 2

    चोला

    सिंदूर में चमेली का तेल मिलाकर प्रतिमा पर चोला चढ़ाएँ। कथा यह है कि सीता को माँग में सिंदूर लगाते देख हनुमान ने पूरे शरीर पर लगा लिया था।

  3. 3

    पूजन

    लाल फूल, लाल लंगोट, दीपक, धूप। भोग में बूँदी के लड्डू, गुड़-चना, केला और पान।

  4. 4

    पाठ

    हनुमान चालीसा, बजरंग बाण, या सुंदरकांड का पूरा पाठ — जयंती पर सुंदरकांड सबसे उपयुक्त माना जाता है।

  5. 5

    राम का स्मरण

    हनुमान की पूजा राम के बिना पूरी नहीं मानी जाती। भोग और पाठ में राम नाम अवश्य।

  6. 6

    दान

    गुड़-चना, लाल वस्त्र या भोजन का दान। बंदरों और गाय को खिलाना इसी दिन की परंपरा है।

क्या करें

  • चोला चढ़ाना हो तो सिंदूर में चमेली का तेल ही मिलाएँ — सरसों या रिफ़ाइंड तेल नहीं।
  • पाठ पूरा करें, बीच में न छोड़ें। सुंदरकांड शुरू किया है तो एक बैठक में पूरा हो।
  • पूजा में राम का नाम अवश्य लें; हनुमान की पूजा राम के बिना अधूरी मानी जाती है।
  • मंगलवार या शनिवार को जयंती पड़े तो व्रत रखने की परंपरा विशेष मानी जाती है।
  • आज गुड़-चना बाँटें और बंदरों को केला खिलाएँ।
  • ब्रह्मचर्य का पालन — यह इस व्रत का स्पष्ट नियम है।

क्या न करें

  • आज माँस, मदिरा और तामसिक भोजन बिल्कुल नहीं — हनुमान के व्रत में यह नियम सबसे कड़ा माना जाता है।
  • स्त्रियाँ पारंपरिक रूप से हनुमान की मूर्ति को स्पर्श नहीं करतीं और चोला नहीं चढ़ातीं; पूजा, पाठ और भोग में कोई मनाही नहीं है।
  • टूटी या खंडित मूर्ति की पूजा न करें।
  • पूजा के बाद प्रसाद स्वयं खाने से पहले बाँटें।
  • आज किसी को अपशब्द न कहें और क्रोध से बचें।
  • चरणामृत हनुमान को अर्पित कर उसे फेंकें नहीं।

आरती

आरती कीजै हनुमान लला की

आरती कीजै हनुमान लला की, दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।

जाके बल से गिरिवर काँपे, रोग-दोष जाके निकट न झाँके॥

अंजनि पुत्र महा बलदाई, संतन के प्रभु सदा सहाई।

दे बीरा रघुनाथ पठाए, लंका जारि सिया सुधि लाए॥

लंका सो कोट समुद्र सी खाई, जात पवनसुत बार न लाई।

लंका जारि असुर संहारे, सियारामजी के काज सँवारे॥

लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे, आनि सजीवन प्राण उबारे।

पैठि पाताल तोरि जम-कारे, अहिरावण की भुजा उखारे॥

बाएँ भुजा असुरदल मारे, दाहिने भुजा संतजन तारे।

सुर-नर-मुनि जन आरती उतारे, जय जय जय हनुमान उचारे॥

कंचन थार कपूर लौ छाई, आरती करत अंजना माई।

जो हनुमानजी की आरती गावै, बसि बैकुंठ परमपद पावै॥

आकाश का अपना कैलेंडर है। आपका भी।

वही गणना आपके जन्म-क्षण पर — हर भाव, हर ग्रह, हर दशा तिथियों सहित।

कहीं अटक गए, या कुछ ठीक नहीं लग रहा?

हर संदेश एक इंसान पढ़ता है — कोई बॉट नहीं। अपनी कुंडली, रिपोर्ट, भुगतान या ऑर्डर — किसी भी बारे में पूछिए। सुबह 9 से रात 9, रोज़।