हरतालिका तीज कब है?
उत्तर
शुक्रवार, 03 सितम्बर 2027
निर्जला व्रत, पार्वती के लिए।
प्रातः काल पूजा मुहूर्त
मुहूर्त
सुबह 6:00 – 8:32
- अवधि
- 2 घंटे 32 मिनट
- सूर्यास्त
- शाम 6:40
- प्रातः काल
- सुबह 6:00 – 8:32
प्रातः काल दिन के पाँच भागों में पहला है: सूर्योदय से सूर्यास्त तक को पाँच बराबर हिस्सों में बाँटा जाता है, और यह उनमें पहला। यह सूर्योदय के साथ चलता है, इसलिए हर वर्ष और हर नगर में इसका घड़ी-समय अलग होता है। ऊपर दी गई खिड़की उसी हिस्से की है जहाँ तिथि सचमुच चल रही है।
उसी दिन क्यों
- यह कौन-सी तिथि है
- भाद्रपद शुक्ल 3
सामान्य नियम से: वह दिन जिसके सूर्योदय पर यह तिथि चल रही हो।
उसके बाद
मंगलवार, 22 अगस्त 2028
भाद्रपद शुक्ल 3
मंगलवार, 11 सितम्बर 2029
भाद्रपद शुक्ल 3
सुबह 6:04 – 6:09
यह तिथि कैसे निकली
त्योहार एक स्थिति है, तारीख़ नहीं। चांद्र मास का नाम उस राशि से पड़ता है जिसमें सूर्य उस अमावस्या पर हो जो मास आरंभ करती है, और तिथि सूर्य से चंद्रमा की दूरी है, बारह-बारह अंश में। दोनों उसी गणना से आते हैं जिससे यह साइट कुंडली बनाती है।
उत्तर भारत मास पूर्णिमा से पूर्णिमा तक गिनता है, इसलिए कृष्ण पक्ष अगले मास का नाम लेता है — वही दिन पुणे में श्रावण कृष्ण तृतीया है और दिल्ली में भाद्रपद कृष्ण तृतीया। यहाँ उत्तर की गणना है, और तिथि ऊपर छपी है ताकि कुछ भी मानना न पड़े।
क्यों मनाई जाती है
भाद्रपद शुक्ल तृतीया — तीनों तीजों में सबसे कठिन। यह पूरे चौबीस घंटे का निर्जला व्रत है और परंपरा में रात्रि जागरण भी इसी का हिस्सा है। नाम भी कथा से बना है: ‘हरत’ यानी हरण और ‘आलिका’ यानी सखी — सखियाँ पार्वती को हर ले गई थीं, इसलिए हरतालिका। तिथि उदया तिथि से तय होती है, यानी जिस दिन सूर्योदय के समय तृतीया चल रही हो। पूजा बालू या मिट्टी से बनाई गई शिव-पार्वती की प्रतिमा की होती है — बाज़ार की मूर्ति की नहीं, क्योंकि कथा में पार्वती ने रेत से ही शिवलिंग बनाया था।
कथा
पार्वती का तप
पार्वती शिव को पति रूप में चाहती थीं और वर्षों तप कर रही थीं — पहले फल पर, फिर पत्तों पर, फिर बिना पत्तों के भी। ‘अपर्णा’ नाम वहीं से है।
पिता का निर्णय
नारद के कहने पर हिमवान ने उनका विवाह विष्णु से तय कर दिया — बिना पार्वती से पूछे।
सखियाँ
पार्वती ने सखियों को बताया। वे उन्हें घने वन में ले गईं और गुफा में छिपा दिया — यही ‘हरण’ है, और यहीं से नाम बना।
रेत का शिवलिंग
गुफा में पार्वती ने रेत से शिवलिंग बनाया और भाद्रपद शुक्ल तृतीया को निर्जल व्रत रखकर रात भर जागकर पूजा की।
वर
शिव प्रकट हुए और उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया। हिमवान भी मान गए। इसीलिए यह व्रत सुहाग और मनचाहे वर — दोनों के लिए रखा जाता है।
सामग्री
- बालू या काली मिट्टी — शिव, पार्वती और गणेश की प्रतिमा बनाने के लिए
- बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल, शमी पत्र — शिव के लिए
- सोलह श्रृंगार का पूरा सामान — पार्वती को अर्पित करने के लिए
- हरे वस्त्र, हरी चूड़ियाँ, मेहँदी
- फुलेरा — फूलों से सजा मंडप
- केला के पत्ते, नारियल, पान, सुपारी
- घी का दीपक — रात भर जलने वाला
- फल और मिष्ठान्न (व्रती के लिए नहीं, भोग के लिए)
पूजा विधि
1
संकल्प
सूर्योदय से पहले स्नान, सोलह श्रृंगार, हरे वस्त्र। निर्जला व्रत का संकल्प — चौबीस घंटे, जल भी नहीं।
2
प्रतिमा बनाना
बालू या मिट्टी से अपने हाथ से शिव, पार्वती और गणेश बनाएँ। कथा का पूरा सार यही है — बाज़ार से लाई मूर्ति परंपरा नहीं है।
3
प्रदोष पूजन
मुख्य पूजा प्रदोष काल में, सूर्यास्त के बाद। फुलेरा सजाकर उसके नीचे प्रतिमाएँ स्थापित करें।
4
षोडश उपचार
शिव को बेलपत्र, धतूरा और शमी; पार्वती को सोलह श्रृंगार एक-एक करके अर्पित करें और उनका नाम लें।
5
कथा और जागरण
हरतालिका की कथा सुनें, फिर रात भर जागरण — हर प्रहर आरती। यह इस व्रत का अनिवार्य हिस्सा माना जाता है, वैकल्पिक नहीं।
6
प्रातः पारण
अगली सुबह आरती के बाद प्रतिमाओं का विसर्जन जल में, फिर सास या बड़ी स्त्री को श्रृंगार का सामान देकर आशीर्वाद लें और व्रत खोलें।
क्या करें
- प्रतिमा अपने हाथ से बालू या मिट्टी की बनाएँ — कथा में पार्वती ने रेत से ही शिवलिंग बनाया था।
- मुख्य पूजा प्रदोष काल में करें, दिन में नहीं।
- रात भर जागरण करें और हर प्रहर आरती — यह इस व्रत का अनिवार्य हिस्सा है।
- पारण अगली सुबह करें, उसी रात नहीं।
- पार्वती को अर्पित श्रृंगार का सामान सुबह किसी सुहागिन को दे दें।
- कुँवारी कन्याएँ भी यह व्रत रख सकती हैं; कथा में पार्वती अविवाहित ही थीं।
क्या न करें
- जल भी न लें — यह पूरे चौबीस घंटे का निर्जला व्रत है, और तीनों तीजों में सबसे कठिन यही है।
- व्रत के दिन सोना नहीं, दिन में भी नहीं; परंपरा में कहा जाता है कि सोने से व्रत का फल घट जाता है।
- व्रत बीच में न तोड़ें — मान्यता है कि जिसने यह व्रत एक बार लिया, उसे जीवन भर निभाना होता है।
- शिव को तुलसी, हल्दी, कुमकुम और केतकी का फूल न चढ़ाएँ।
- आज काले या सफ़ेद वस्त्र न पहनें।
- क्रोध, कलह और किसी की निंदा से बचें।
आरती
शिव-पार्वती आरती
जय पार्वती माता, जय शिव शंकर स्वामी।
दोनों की जोड़ी सोहे, तुम अंतर्यामी॥
बालू की प्रतिमा से, पूजन तूने कीना।
निर्जल व्रत रख माता, शिव को वर लीना॥
सखियाँ हर ले आईं, गहन वन के बीचा।
गुफा में तप कर माता, शिव मन को खींचा॥
भादों शुक्ल तृतीया, व्रत यह भारी है।
जागरण रात भर का, रीत निराली है॥
सोलह श्रृंगार अर्पण, माता को भाता।
जो नारी व्रत धारे, सुहाग अटल पाता॥
शिव-पार्वती की आरती, जो कोई नर-नारी गावे।
मनवांछित वर पावे, घर मंगल छावे॥
आकाश का अपना कैलेंडर है। आपका भी।
वही गणना आपके जन्म-क्षण पर — हर भाव, हर ग्रह, हर दशा तिथियों सहित।
