होलिका दहन / होली कब है?

उत्तर

रविवार, 21 मार्च 2027

पूर्णिमा को दहन; रंग अगले दिन।

प्रदोष काल पूजा मुहूर्त

मुहूर्त

शाम 6:32 – रात 8:56

अवधि
2 घंटे 24 मिनट
सूर्यास्त
शाम 6:32
प्रदोष काल
शाम 6:32 – रात 8:56

प्रदोष काल स्थानीय सूर्यास्त से आरंभ होकर छह घटिका — तीन मुहूर्त, 2 घंटे 24 मिनट — चलता है, जैसा निर्णयसिंधु और धर्मसिंधु में है। यह सूर्यास्त के साथ खिसकता है, इसलिए हर वर्ष और हर नगर में घड़ी का समय अलग होता है। ऊपर का मुहूर्त उसी का वह भाग है जिसमें तिथि सचमुच चल रही हो।

उसी दिन क्यों

यह कौन-सी तिथि है
फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा

यह सूर्योदय से नहीं, प्रदोष से तय होती है। तिथि उस दिन के सूर्योदय पर चल सकती है जिसकी संध्या तक वह बीत चुकी हो — और इसी से सामान्य गणना वाला कैलेंडर एक दिन पीछे रह जाता है।

उसके बाद

  • शुक्रवार, 10 मार्च 2028

    फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा

    शाम 6:26 – रात 8:50

  • बुधवार, 28 फ़रवरी 2029

    फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा

    शाम 6:20 – रात 8:44

यह तिथि कैसे निकली

त्योहार एक स्थिति है, तारीख़ नहीं। चांद्र मास का नाम उस राशि से पड़ता है जिसमें सूर्य उस अमावस्या पर हो जो मास आरंभ करती है, और तिथि सूर्य से चंद्रमा की दूरी है, बारह-बारह अंश में। दोनों उसी गणना से आते हैं जिससे यह साइट कुंडली बनाती है।

उत्तर भारत मास पूर्णिमा से पूर्णिमा तक गिनता है, इसलिए कृष्ण पक्ष अगले मास का नाम लेता है — वही दिन पुणे में श्रावण कृष्ण तृतीया है और दिल्ली में भाद्रपद कृष्ण तृतीया। यहाँ उत्तर की गणना है, और तिथि ऊपर छपी है ताकि कुछ भी मानना न पड़े।

क्यों मनाई जाती है

फाल्गुन की पूर्णिमा — रात को होलिका दहन, अगले दिन रंग। दहन प्रदोष काल में होता है और उसमें भी भद्रा टालनी पड़ती है: भद्रा में होलिका जलाना वर्जित माना गया है, इसलिए कई साल दहन आधी रात के बाद होता है। कथा प्रह्लाद की है — होलिका को वर था कि आग उसे न जलाए, पर वह वर तब टूटा जब उसने उसका उपयोग किसी निर्दोष को मारने में किया। इसीलिए जलती है होलिका, और बचता है प्रह्लाद। अगले दिन का रंग वृंदावन से आया — कृष्ण ने अपने साँवले रंग की शिकायत की तो यशोदा ने कहा, राधा पर रंग डाल दो।

कथा

वरदान

हिरण्यकशिपु ने तप से वर पाया कि उसे न दिन में मृत्यु हो न रात में, न घर में न बाहर, न मनुष्य से न पशु से, न अस्त्र से न शस्त्र से। उसने स्वयं को ईश्वर घोषित कर दिया।

प्रह्लाद

उसका अपना पुत्र प्रह्लाद विष्णु का भक्त था और पिता को ईश्वर मानने से इनकार करता रहा।

होलिका

बहन होलिका के पास ऐसा वस्त्र था जिसे आग न जलाती। हिरण्यकशिपु ने कहा — प्रह्लाद को गोद में लेकर चिता पर बैठ जाओ।

उल्टा फल

आग जली तो वस्त्र उड़कर प्रह्लाद पर आ गया। होलिका जल गई, प्रह्लाद बच गया — वर तब काम नहीं आया जब उसका उपयोग निर्दोष को मारने में हुआ।

नरसिंह

अंत में विष्णु नरसिंह रूप में — आधे मनुष्य आधे सिंह — संध्या के समय, देहरी पर, नखों से हिरण्यकशिपु का वध कर हर शर्त को पूरा करते हुए तोड़ गए।

रंग

अगले दिन का रंग वृंदावन की कथा से है। कृष्ण ने माँ से पूछा कि राधा गोरी और मैं साँवला क्यों; यशोदा हँसकर बोलीं — जाकर उसे अपने रंग में रंग दो।

सामग्री

  • होलिका के लिए लकड़ी, उपले (गोबर के कंडे) और सूखी घास
  • कच्चा सूत — होलिका के चारों ओर लपेटने के लिए
  • गेहूँ की नई बालियाँ, चना और जौ — आग में भूनने के लिए
  • नारियल, गुड़, बताशे
  • रोली, अक्षत, हल्दी, गंगाजल, कलश
  • गुलाल — परंपरा में टेसू (पलाश) के फूल से बना
  • पापड़, गुझिया और ठंडाई
  • अगले दिन के लिए सूखे रंग और सरसों का तेल (त्वचा पर लगाने के लिए)

पूजा विधि

  1. 1

    होलिका सजाना

    कई दिन पहले से चौराहे पर लकड़ी और उपले जमा किए जाते हैं। बीच में एरंड या गूलर का डंडा गाड़ा जाता है।

  2. 2

    समय

    दहन प्रदोष काल में, पर भद्रा टालकर। भद्रा का समय पंचांग में दिया होता है — यही कारण है कि कुछ वर्ष दहन आधी रात के बाद होता है।

  3. 3

    पूजन

    दहन से पहले होलिका के चारों ओर तीन, पाँच या सात बार कच्चा सूत लपेटें। जल, रोली, अक्षत, फूल, गुड़ और नारियल अर्पित करें।

  4. 4

    दहन

    अग्नि प्रज्वलित कर परिक्रमा करें। नई फ़सल की बालियाँ, चना और जौ आग में भूनें — यह उपज का पहला भाग अग्नि को देने की रीति है।

  5. 5

    भस्म

    अगली सुबह होलिका की राख माथे पर लगाई जाती है और कुछ घर ले जाते हैं।

  6. 6

    धुलेंडी

    अगले दिन रंग। पहले बड़ों के पैरों पर गुलाल, फिर आपस में। शाम को स्नान कर मिलना-जुलना।

क्या करें

  • दहन का समय भद्रा टालकर लें — यह होली का सबसे भूला जाने वाला नियम है, और यही तय करता है कि आग कब जले।
  • होलिका में नई फ़सल की बालियाँ ज़रूर भूनें; यह त्योहार का कृषि वाला हिस्सा है।
  • रंग खेलने से पहले शरीर और बालों पर सरसों या नारियल का तेल लगाएँ।
  • गुलाल सूखा और प्राकृतिक लें — टेसू के फूल से बना रंग परंपरा का असली रंग है।
  • पहले बड़ों के चरणों में गुलाल रखें, फिर खेलें।
  • अगली सुबह होलिका की राख माथे पर लगाएँ — परंपरा में यह रक्षा मानी जाती है।

क्या न करें

  • भद्रा काल में होलिका न जलाएँ।
  • होलिका में प्लास्टिक, टायर, रबर या रसायन न डालें — यह अग्नि पूजा है, कूड़ा जलाना नहीं।
  • पीपल, बरगद, नीम, आँवला जैसे पूजनीय पेड़ की लकड़ी न जलाएँ। सूखी और गिरी हुई लकड़ी लें, हरा पेड़ न काटें।
  • किसी पर ज़बरदस्ती रंग न डालें — परंपरा में भी होली सहमति की है, ‘बुरा न मानो’ अनुमति नहीं है।
  • रासायनिक और पक्के रंग, वार्निश, ग्रीस से बचें; आँख और त्वचा दोनों के लिए ख़तरा है।
  • नवविवाहिता का पहली होली पर ससुराल में होलिका दहन देखना कई परंपराओं में वर्जित माना जाता है।

आरती

श्री नरसिंह आरती

ॐ जय नरसिंह हरे, प्रभु जय नरसिंह हरे।

भक्त प्रह्लाद की रक्षा, हिरण्यकशिपु हरे॥

तुम हो दीनदयाला, भक्तन हितकारी।

अद्भुत रूप तुम्हारा, नर-हरि अवतारी॥

खंभ फाड़कर प्रकटे, संध्या की बेला।

देहरी पर संहारे, नख से वह चेला॥

न दिन था न रात्रि, न घर था न बाहर।

न नर था न पशु कोई, न अस्त्र न शस्त्र॥

होलिका जल गई माता, प्रह्लाद बच आया।

वर का बल न चला जब, निर्दोष सताया॥

श्री नरसिंह जी की आरती, जो कोई नर गावे।

भय-संकट मिट जावे, निर्भय हो जावे॥

आकाश का अपना कैलेंडर है। आपका भी।

वही गणना आपके जन्म-क्षण पर — हर भाव, हर ग्रह, हर दशा तिथियों सहित।

कहीं अटक गए, या कुछ ठीक नहीं लग रहा?

हर संदेश एक इंसान पढ़ता है — कोई बॉट नहीं। अपनी कुंडली, रिपोर्ट, भुगतान या ऑर्डर — किसी भी बारे में पूछिए। सुबह 9 से रात 9, रोज़।