कृष्ण जन्माष्टमी कब है?

उत्तर

मंगलवार, 24 अगस्त 2027

कृष्ण जन्म, अष्टमी की अर्धरात्रि।

निशीथ काल पूजा मुहूर्त

मुहूर्त

रात 12:01 – 12:45

अवधि
44 मिनट
सूर्यास्त
शाम 6:51
निशीथ काल
रात 12:01 – 12:45

निशीथ काल रात्रि का आठवाँ मुहूर्त है: सूर्यास्त से अगले सूर्योदय तक की रात के पंद्रह बराबर भाग, जिनमें से यह बीच वाला है। यह घड़ी की बारह बजे नहीं है — दिल्ली के अक्षांश पर यह वर्ष भर में आधा घंटा खिसक जाता है। ऊपर का मुहूर्त उसी का वह भाग है जिसमें तिथि सचमुच चल रही हो।

उसी दिन क्यों

यह कौन-सी तिथि है
भाद्रपद कृष्ण 8

यह अर्धरात्रि से तय होती है। तिथि को रात के मध्य में चलना चाहिए, सूर्योदय पर नहीं — और इससे दिन एक आगे-पीछे हो सकता है।

उसके बाद

  • रविवार, 13 अगस्त 2028

    भाद्रपद कृष्ण 8

    रात 12:04 – 12:47

  • शुक्रवार, 31 अगस्त 2029

    भाद्रपद कृष्ण 8

    रात 11:58 – 12:43

यह तिथि कैसे निकली

त्योहार एक स्थिति है, तारीख़ नहीं। चांद्र मास का नाम उस राशि से पड़ता है जिसमें सूर्य उस अमावस्या पर हो जो मास आरंभ करती है, और तिथि सूर्य से चंद्रमा की दूरी है, बारह-बारह अंश में। दोनों उसी गणना से आते हैं जिससे यह साइट कुंडली बनाती है।

उत्तर भारत मास पूर्णिमा से पूर्णिमा तक गिनता है, इसलिए कृष्ण पक्ष अगले मास का नाम लेता है — वही दिन पुणे में श्रावण कृष्ण तृतीया है और दिल्ली में भाद्रपद कृष्ण तृतीया। यहाँ उत्तर की गणना है, और तिथि ऊपर छपी है ताकि कुछ भी मानना न पड़े।

क्यों मनाई जाती है

भाद्रपद कृष्ण अष्टमी — कृष्ण का जन्म, और वह भी आधी रात को। इसीलिए तारीख़ इस बात से तय होती है कि अष्टमी जिस रात के निशीथ काल में — अर्ध रात्रि के आठवें मुहूर्त में — चल रही हो। भागवत का लिखा हुआ पूरा योग यही है: भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, रोहिणी नक्षत्र, बुधवार, अर्ध रात्रि। जिस वर्ष अष्टमी और रोहिणी दोनों एक साथ मिलें उसे जयंती योग कहते हैं और वह विशेष माना जाता है। यही वजह है कि स्मार्त और वैष्णव परंपरा में कभी-कभी दो दिन मनती है — एक निशीथ से गिनती है, दूसरी सूर्योदय से।

कथा

आकाशवाणी

कंस अपनी बहन देवकी को विदा कराने ले जा रहा था कि आकाशवाणी हुई — इसी का आठवाँ पुत्र तुझे मारेगा। उसने दोनों को कारागार में डाल दिया।

सात संतानें

कंस ने एक-एक कर छह संतानें मार डालीं। सातवाँ गर्भ रोहिणी में स्थानांतरित हुआ — वही बलराम हैं।

आठवीं रात

आठवें की रात भादों की काली रात थी, बारिश हो रही थी। जन्म होते ही पहरेदार सो गए, बेड़ियाँ खुल गईं और कारागार के द्वार अपने आप खुल गए।

यमुना

वसुदेव शिशु को टोकरी में लेकर निकले। यमुना उफान पर थी, पर वह रास्ता देती गई; शेषनाग ने ऊपर फन का छत्र किया।

गोकुल

गोकुल में यशोदा के पास उसी रात एक कन्या जन्मी थी। वसुदेव कृष्ण को वहाँ रखकर कन्या ले आए। कंस ने उसे पटकना चाहा तो वह हाथ से छूटकर आकाश में चली गई और बोली — जो तुझे मारेगा वह जन्म ले चुका है।

सामग्री

  • बाल गोपाल की प्रतिमा और चाँदी या पीतल का पालना
  • पंचामृत — दूध, दही, घी, शहद, शक्कर
  • माखन-मिश्री — कृष्ण का अपना भोग
  • धनिया पंजीरी — जन्माष्टमी का निश्चित प्रसाद
  • तुलसी दल — बिना तुलसी भोग अधूरा
  • मोर पंख, बाँसुरी, पीला वस्त्र, वैजयंती माला
  • ककड़ी (डंठल समेत) — नाल छेदन की परंपरा के लिए
  • गंगाजल, कलश, शंख, घंटी
  • छप्पन भोग या यथासंभव व्यंजन

पूजा विधि

  1. 1

    संकल्प

    प्रातः स्नान कर दिन भर का व्रत — निर्जल या फलाहार। संकल्प में जन्म तक जागने की बात होती है।

  2. 2

    सजावट

    झाँकी सजाएँ — कारागार, यमुना, गोकुल। पालना तैयार रखें और उसमें पीला वस्त्र बिछाएँ।

  3. 3

    ककड़ी

    डंठल वाली ककड़ी पूजा में रखें। मध्यरात्रि पर उसका डंठल सिक्के से काटा जाता है — यह नाल काटने का प्रतीक है, यानी कृष्ण का माँ से अलग होना।

  4. 4

    निशीथ पूजन

    ठीक मध्यरात्रि में — निशीथ काल में — जन्म। शंख, घंटी, ‘नंद के आनंद भयो’। तुरंत पंचामृत से अभिषेक, फिर गंगाजल।

  5. 5

    श्रृंगार और झूला

    नए वस्त्र, मोर पंख, बाँसुरी, वैजयंती माला। पालने में बिठाकर झुलाएँ।

  6. 6

    भोग और आरती

    माखन-मिश्री, धनिया पंजीरी और छप्पन भोग — तुलसी दल के साथ। फिर आरती।

  7. 7

    पारण

    अष्टमी और रोहिणी दोनों समाप्त होने पर पारण। बहुत घरों में मध्यरात्रि की पूजा के बाद ही प्रसाद लेकर व्रत खोल लिया जाता है — दोनों परंपराएँ चलती हैं।

क्या करें

  • पूजा निशीथ काल में करें — मध्यरात्रि ही जन्म का समय है, शाम को नहीं।
  • ककड़ी डंठल समेत रखें और मध्यरात्रि पर डंठल काटें; यह जन्माष्टमी की अपनी और सबसे कम जानी जाने वाली रीति है।
  • भोग में तुलसी दल अवश्य हो; तुलसी एक दिन पहले तोड़कर रखें।
  • अभिषेक कच्चे दूध और पंचामृत से करें।
  • धनिया पंजीरी बनाएँ — व्रत का प्रसाद यही है, क्योंकि इसमें अनाज नहीं होता।
  • रोहिणी नक्षत्र का समय भी देख लें; अष्टमी और रोहिणी का साथ आना विशेष माना जाता है।

क्या न करें

  • आज अनाज न लें — व्रत में फलाहार, सिंघाड़े या कुट्टू का आटा, और पंजीरी।
  • मध्यरात्रि से पहले पारण न करें; व्रत का पूरा अर्थ जन्म तक जागने में है।
  • तुलसी अष्टमी के दिन न तोड़ें।
  • प्याज़, लहसुन, माँस और मदिरा घर में नहीं।
  • आज गाय और बछड़े को कष्ट न पहुँचाएँ; परंपरा में यह विशेष रूप से कहा गया है।
  • टूटी बाँसुरी या खंडित मूर्ति की पूजा न करें।

आरती

आरती कुंजबिहारी की

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।

गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला।

श्रवण में कुंडल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला॥

गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली।

लतन में ठाढ़े बनमाली, भ्रमर सी अलक कस्तूरी तिलक॥

चंद्र सी झलक ललित छवि श्यामा प्यारी की।

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं।

गगन सों सुमन रासि बरसै, बजे मुरचंग मधुर मृदंग॥

ग्वालिन संग अतुल रति गोप कुमारी की।

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

जहाँ ते प्रकट भई गंगा, कलुष कलि हारिणी श्रीगंगा।

स्मरन ते होत मोह भंगा, बसी शिव शीश जटा के बीच॥

हरै अघ कीच चरन छवि श्रीबनवारी की।

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

आकाश का अपना कैलेंडर है। आपका भी।

वही गणना आपके जन्म-क्षण पर — हर भाव, हर ग्रह, हर दशा तिथियों सहित।

कहीं अटक गए, या कुछ ठीक नहीं लग रहा?

हर संदेश एक इंसान पढ़ता है — कोई बॉट नहीं। अपनी कुंडली, रिपोर्ट, भुगतान या ऑर्डर — किसी भी बारे में पूछिए। सुबह 9 से रात 9, रोज़।