कजरी तीज कब है?

उत्तर

शुक्रवार, 20 अगस्त 2027

कृष्ण पक्ष की तृतीया।

उसी दिन क्यों

यह कौन-सी तिथि है
भाद्रपद कृष्ण 3

सामान्य नियम से: वह दिन जिसके सूर्योदय पर यह तिथि चल रही हो।

उसके बाद

  • मंगलवार, 08 अगस्त 2028

    भाद्रपद कृष्ण 3

  • सोमवार, 27 अगस्त 2029

    भाद्रपद कृष्ण 3

यह तिथि कैसे निकली

त्योहार एक स्थिति है, तारीख़ नहीं। चांद्र मास का नाम उस राशि से पड़ता है जिसमें सूर्य उस अमावस्या पर हो जो मास आरंभ करती है, और तिथि सूर्य से चंद्रमा की दूरी है, बारह-बारह अंश में। दोनों उसी गणना से आते हैं जिससे यह साइट कुंडली बनाती है।

उत्तर भारत मास पूर्णिमा से पूर्णिमा तक गिनता है, इसलिए कृष्ण पक्ष अगले मास का नाम लेता है — वही दिन पुणे में श्रावण कृष्ण तृतीया है और दिल्ली में भाद्रपद कृष्ण तृतीया। यहाँ उत्तर की गणना है, और तिथि ऊपर छपी है ताकि कुछ भी मानना न पड़े।

क्यों मनाई जाती है

भाद्रपद कृष्ण तृतीया — साल की तीन तीजों में से दूसरी। हरियाली तीज सावन में आती है, कजरी इसके ठीक पंद्रह दिन बाद, और हरतालिका भाद्रपद शुक्ल में। कजरी का अपना रूप है: यह गीतों का त्योहार है — कजरी वही बरसात का लोकगीत है जो मिर्ज़ापुर और बनारस से निकलकर पूरे पूर्वांचल में गाया जाता है, और उसमें प्रायः पति के परदेस जाने का विरह होता है। पूजा नीम की डाल की होती है, और चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खुलता है — सूर्यास्त पर नहीं।

कथा

नीम की डाल

कजरी की मूल पूजा नीम की डाल की है। स्त्रियाँ उसे दीवार के पास गाड़कर उसमें जल, दूध और सत्तू चढ़ाती हैं।

कजली वन

एक कथा कहती है कि कजली वन के राजा दादूराय युद्ध में गए और लौटे नहीं; रानी नागमती ने उनकी स्मृति में जो गीत गाए वही कजरी बने।

नाग और सत्तू

दूसरी कथा में एक स्त्री ने भूलवश साँप के बच्चों को मार दिया। नागिन बदला लेने आई पर उसे व्रत करती और सत्तू चढ़ाती देखकर लौट गई — इसीलिए आज सत्तू का भोग है।

पार्वती

तीनों तीजों की मूल कथा एक ही है — पार्वती ने शिव को पति रूप में पाने के लिए वर्षों तप किया, और तीज उसी तप की स्मृति है।

गीत

कजरी का अपना अर्थ इसी में है: व्रत अकेले नहीं रखा जाता, गाकर रखा जाता है। स्त्रियाँ झूला डालकर सामूहिक रूप से गाती हैं।

सामग्री

  • नीम की डाल — पूजा का मुख्य आधार
  • सत्तू — जौ या चने का, गुड़ या घी मिलाकर; इसी दिन का भोग
  • गाय का दूध, दही, जल
  • चंद्रमा को अर्घ्य देने के लिए ताँबे का लोटा
  • सिंदूर, मेहँदी, चूड़ी और सोलह श्रृंगार
  • हरे वस्त्र और हरी चूड़ियाँ
  • गुझिया, मालपुआ और मौसमी फल
  • गाय के लिए रोटी और गुड़ — व्रत खोलने से पहले

पूजा विधि

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    संकल्प

    प्रातः स्नान कर सोलह श्रृंगार और हरे वस्त्र। सुहागिनें पति के लिए, कुँवारी कन्याएँ अच्छे वर के लिए संकल्प लेती हैं। परंपरा में निर्जला।

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    नीम पूजन

    नीम की डाल दीवार के पास गाड़ें। उस पर जल, दूध, सत्तू, फूल और सिंदूर चढ़ाएँ। दीपक जलाएँ।

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    कथा और गीत

    कजरी की कथा सुनें, फिर सामूहिक गीत — यही इस तीज की पहचान है। झूला डालने की परंपरा भी आज की है।

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    गौ सेवा

    व्रत खोलने से पहले गाय को रोटी पर गुड़ रखकर खिलाएँ। यह इस व्रत का निश्चित नियम है।

  5. 5

    चंद्र अर्घ्य

    चंद्रोदय पर ताँबे के लोटे से चंद्रमा को अर्घ्य — जल में दूध और अक्षत मिलाकर।

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    पारण

    अर्घ्य के बाद सत्तू और फल से व्रत खोलें। सास या बड़ी स्त्री का आशीर्वाद पहले।

क्या करें

  • व्रत चंद्रमा को अर्घ्य देकर खोलें, सूर्यास्त पर नहीं — कजरी में चंद्रोदय का इंतज़ार होता है।
  • व्रत खोलने से पहले गाय को रोटी और गुड़ खिलाएँ; यह इस तीज का निश्चित नियम है।
  • नीम की डाल की पूजा करें — कजरी की असली पूजा यही है, कोई मूर्ति नहीं।
  • सत्तू का भोग अवश्य लगाएँ और उसी से पारण करें।
  • गीत गाएँ या सुनें — कजरी बिना गीत के अधूरी मानी जाती है।

क्या न करें

  • आज नीम का पेड़ न काटें और उसकी डाल पूजा के अलावा किसी काम में न लें।
  • पारण से पहले जल भी नहीं; यह निर्जला व्रत है।
  • आज काले और सफ़ेद वस्त्र न पहनें; हरा इस तीज का रंग है।
  • श्रृंगार अधूरा न रखें और चूड़ियाँ टूटी न पहनें।
  • व्रत के दिन क्रोध और कलह से बचें।

आरती

श्री पार्वती जी की आरती

जय पार्वती माता, जय पार्वती माता।

ब्रह्मा सनातन देवी, शुभ फल की दाता॥

अरिकुल पद्म विनासनि, जय सेवक त्राता।

जग जीवन जगदम्बा, हरिहर गुण गाता॥

सिंह को वाहन साजे, कुंडल है साथा।

देव वधू जस गावत, नृत्य करत ताथा॥

सतयुग रूप शील अति सुंदर, नाम सती कहलाता।

हेमांचल घर जन्मी, सखियन संग राता॥

शुम्भ-निशुम्भ विदारे, हेमांचल स्थाता।

सहस भुजा तनु धरिके, चक्र लियो हाथा॥

सृष्टि रूप तुही जननी, शिव संग रंग राता।

नंदी भृंगी बीन लही, हाथन मृदु ताता॥

श्री प्रताप आरती माँ की, जो कोई नर गाता।

सदा सुखी नित रहता, सुख सम्पत्ति पाता॥

आकाश का अपना कैलेंडर है। आपका भी।

वही गणना आपके जन्म-क्षण पर — हर भाव, हर ग्रह, हर दशा तिथियों सहित।

कहीं अटक गए, या कुछ ठीक नहीं लग रहा?

हर संदेश एक इंसान पढ़ता है — कोई बॉट नहीं। अपनी कुंडली, रिपोर्ट, भुगतान या ऑर्डर — किसी भी बारे में पूछिए। सुबह 9 से रात 9, रोज़।