कार्तिक पूर्णिमा कब है?

उत्तर

मंगलवार, 24 नवम्बर 2026

गंगा तट पर देव दीपावली।

उसी दिन क्यों

यह कौन-सी तिथि है
कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा

सामान्य नियम से: वह दिन जिसके सूर्योदय पर यह तिथि चल रही हो।

उसके बाद

  • रविवार, 14 नवम्बर 2027

    कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा

  • गुरुवार, 02 नवम्बर 2028

    कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा

यह तिथि कैसे निकली

त्योहार एक स्थिति है, तारीख़ नहीं। चांद्र मास का नाम उस राशि से पड़ता है जिसमें सूर्य उस अमावस्या पर हो जो मास आरंभ करती है, और तिथि सूर्य से चंद्रमा की दूरी है, बारह-बारह अंश में। दोनों उसी गणना से आते हैं जिससे यह साइट कुंडली बनाती है।

उत्तर भारत मास पूर्णिमा से पूर्णिमा तक गिनता है, इसलिए कृष्ण पक्ष अगले मास का नाम लेता है — वही दिन पुणे में श्रावण कृष्ण तृतीया है और दिल्ली में भाद्रपद कृष्ण तृतीया। यहाँ उत्तर की गणना है, और तिथि ऊपर छपी है ताकि कुछ भी मानना न पड़े।

क्यों मनाई जाती है

कार्तिक की पूर्णिमा — शिव ने इसी दिन त्रिपुरासुर का वध किया था, इसीलिए इसे त्रिपुरारी पूर्णिमा और देव दीपावली कहते हैं। मान्यता है कि इसी रात देवता काशी के घाटों पर उतरकर दीप जलाते हैं। यही दिन गुरु नानक देव का प्रकाश पर्व भी है, और यही कार्तिक स्नान के पूरे महीने का अंतिम दिन। विष्णु देवउठनी एकादशी को जागते हैं और मत्स्य अवतार इसी पूर्णिमा से जुड़ा है — इसलिए यह एक साथ शिव का भी दिन है और विष्णु का भी।

कथा

तीन नगर

तारकासुर के तीन पुत्रों ने तप से वर पाया कि उनके तीन उड़ते नगर — सोने, चाँदी और लोहे के — केवल तब नष्ट हों जब तीनों एक सीध में आएँ, और वह भी एक ही बाण से।

हज़ार वर्ष

वे तीनों नगर हज़ार वर्ष में एक बार ही एक रेखा में आते थे। उस बल पर उन्होंने तीनों लोक जीत लिए।

एक क्षण

देवताओं की प्रार्थना पर शिव ने प्रतीक्षा की। जिस क्षण तीनों नगर एक सीध में आए, उन्होंने पाशुपत बाण छोड़ा।

त्रिपुरारी

तीनों नगर एक साथ भस्म हो गए और शिव त्रिपुरारी कहलाए। वही दिन कार्तिक पूर्णिमा है।

देव दीपावली

देवताओं ने प्रसन्न होकर काशी में दीप जलाए — वही आज भी हर वर्ष होता है, और उसे देव दीपावली कहते हैं।

सामग्री

  • मिट्टी के दीये और तिल का तेल — नदी में दीपदान के लिए
  • पत्ते का दोना या केले के पत्ते की नाव
  • गंगाजल और ताँबे का लोटा
  • बेलपत्र, सफ़ेद फूल, धतूरा — शिव पूजन के लिए
  • तुलसी दल — विष्णु पूजन के लिए
  • काले तिल और जौ — स्नान-दान के लिए
  • अन्न, वस्त्र और गुड़ — दान के लिए
  • कपूर, धूप, चंदन

पूजा विधि

  1. 1

    स्नान

    ब्रह्म मुहूर्त में नदी या सरोवर में स्नान — कार्तिक स्नान का यह अंतिम और सबसे बड़ा दिन है। घर पर हो तो जल में गंगाजल और तिल मिलाएँ।

  2. 2

    शिव और विष्णु पूजन

    शिव को बेलपत्र और जल, विष्णु को तुलसी। दोनों की पूजा एक ही दिन होती है — यही इस पूर्णिमा की विशेषता है।

  3. 3

    दीपदान

    संध्या को नदी, तालाब या घर के जल-पात्र में दीप प्रवाहित करें। परंपरा में 365 दीप या सामर्थ्य अनुसार — यही देव दीपावली है।

  4. 4

    तुलसी के नीचे दीप

    घर में तुलसी के पास एक दीप पूरी रात जलता रखें।

  5. 5

    दान

    अन्न, वस्त्र, तिल और गुड़ का दान। परंपरा में इस दिन का दान वर्ष भर के दान के बराबर माना गया है।

  6. 6

    सत्यनारायण कथा

    बहुत घरों में आज सत्यनारायण की कथा होती है — पूर्णिमा उसका निश्चित दिन है।

क्या करें

  • प्रातः स्नान ब्रह्म मुहूर्त में करें — कार्तिक स्नान का यह समापन दिन है।
  • शिव और विष्णु दोनों की पूजा करें; यह उन गिने-चुने दिनों में है जब दोनों एक साथ पूजे जाते हैं।
  • दीपदान संध्या को करें और दीप मिट्टी के ही लें। जल में बहाने से पहले तेल-बाती ठीक से लगा लें।
  • तुलसी के पास रात भर एक दीप जलता रहे।
  • आज दान अवश्य करें — अन्न, वस्त्र या तिल-गुड़, जो हो सके।
  • गुरु नानक जयंती भी आज है; गुरुद्वारे जाना या लंगर में सेवा इसी दिन का हिस्सा है।

क्या न करें

  • आज माँस, मदिरा और तामसिक भोजन नहीं; कार्तिक का पूरा महीना इसी नियम पर चलता है।
  • प्लास्टिक या थर्माकोल के दीये जल में न बहाएँ — मिट्टी या पत्ते ही।
  • आज तुलसी के पत्ते न तोड़ें; तोड़ने हों तो एक दिन पहले तोड़ लें।
  • किसी को अपशब्द न कहें और आज विवाद टालें — पूर्णिमा का व्रत इसी पर टिका है।
  • आज बाल-नाखून न कटवाएँ।

आरती

ॐ जय शिव ओंकारा

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥

एकानन चतुरानन पंचानन राजे।

हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥

दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज ते सोहे।

तीनों रूप निरखता त्रिभुवन जन मोहे॥

अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी।

त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।

सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे॥

कर के मध्य कमंडल चक्र त्रिशूलधारी।

सुखकारी दुखहारी जगपालनकारी॥

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।

प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥

त्रिगुण स्वामी जी की आरती जो कोई नर गावे।

कहत शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावे॥

आकाश का अपना कैलेंडर है। आपका भी।

वही गणना आपके जन्म-क्षण पर — हर भाव, हर ग्रह, हर दशा तिथियों सहित।

कहीं अटक गए, या कुछ ठीक नहीं लग रहा?

हर संदेश एक इंसान पढ़ता है — कोई बॉट नहीं। अपनी कुंडली, रिपोर्ट, भुगतान या ऑर्डर — किसी भी बारे में पूछिए। सुबह 9 से रात 9, रोज़।