महाशिवरात्रि कब है?
उत्तर
शनिवार, 06 मार्च 2027
कृष्ण चतुर्दशी, रात्रि जागरण।
निशीथ काल पूजा मुहूर्त
मुहूर्त
रात 12:07 – 12:56
- अवधि
- 49 मिनट
- सूर्यास्त
- शाम 6:23
- निशीथ काल
- रात 12:07 – 12:56
निशीथ काल रात्रि का आठवाँ मुहूर्त है: सूर्यास्त से अगले सूर्योदय तक की रात के पंद्रह बराबर भाग, जिनमें से यह बीच वाला है। यह घड़ी की बारह बजे नहीं है — दिल्ली के अक्षांश पर यह वर्ष भर में आधा घंटा खिसक जाता है। ऊपर का मुहूर्त उसी का वह भाग है जिसमें तिथि सचमुच चल रही हो।
उसी दिन क्यों
- यह कौन-सी तिथि है
- फाल्गुन कृष्ण 14
यह अर्धरात्रि से तय होती है। तिथि को रात के मध्य में चलना चाहिए, सूर्योदय पर नहीं — और इससे दिन एक आगे-पीछे हो सकता है।
उसके बाद
बुधवार, 23 फ़रवरी 2028
फाल्गुन कृष्ण 14
रात 12:09 – 12:59
रविवार, 11 फ़रवरी 2029
फाल्गुन कृष्ण 14
रात 12:09 – 1:00
यह तिथि कैसे निकली
त्योहार एक स्थिति है, तारीख़ नहीं। चांद्र मास का नाम उस राशि से पड़ता है जिसमें सूर्य उस अमावस्या पर हो जो मास आरंभ करती है, और तिथि सूर्य से चंद्रमा की दूरी है, बारह-बारह अंश में। दोनों उसी गणना से आते हैं जिससे यह साइट कुंडली बनाती है।
उत्तर भारत मास पूर्णिमा से पूर्णिमा तक गिनता है, इसलिए कृष्ण पक्ष अगले मास का नाम लेता है — वही दिन पुणे में श्रावण कृष्ण तृतीया है और दिल्ली में भाद्रपद कृष्ण तृतीया। यहाँ उत्तर की गणना है, और तिथि ऊपर छपी है ताकि कुछ भी मानना न पड़े।
क्यों मनाई जाती है
फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी — और यह इकलौता बड़ा व्रत है जो दिन का नहीं, रात का है। तारीख़ भी इसी से तय होती है: चतुर्दशी जिस रात के निशीथ काल में — अर्ध रात्रि के आठवें मुहूर्त में — चल रही हो, महाशिवरात्रि उसी दिन है, भले अगली सुबह सूर्योदय पर चतुर्दशी हो या न हो। कारण कथा में है: इसी रात शिव पहली बार लिंग रूप में प्रकट हुए, इसी रात उनका पार्वती से विवाह हुआ, और इसी रात उन्होंने हलाहल विष कंठ में धारण किया। चारों प्रहर की पूजा इसीलिए है — रात के चार हिस्से, चार बार अभिषेक।
कथा
अनंत स्तंभ
ब्रह्मा और विष्णु में विवाद हुआ कि बड़ा कौन है। तभी उनके बीच एक अग्नि-स्तंभ प्रकट हुआ जिसका न आदि दिखता था न अंत।
खोज
ब्रह्मा हंस बनकर ऊपर उड़े, विष्णु वराह बनकर नीचे खोदते गए। युगों बाद दोनों लौट आए — किसी को छोर नहीं मिला।
प्रकट होना
तब उस स्तंभ से शिव प्रकट हुए। वही पहला लिंग था, और वह रात यही रात है।
विष
दूसरी कथा समुद्र मंथन की है — हलाहल निकला तो कोई नहीं ले सका। शिव ने पी लिया और पार्वती ने कंठ में रोक दिया। वे नीलकंठ हुए, और देवताओं ने उन्हें जगाए रखने के लिए रात भर जागरण किया।
शिकारी
तीसरी कथा एक शिकारी की है जो रात भर बेल के पेड़ पर बैठा रहा और अनजाने में पत्ते नीचे के लिंग पर गिराता रहा — भूखा, प्यासा, जागता। सुबह वह बदल चुका था। इसीलिए बेलपत्र और जागरण दोनों इस रात के केंद्र में हैं।
सामग्री
- बेलपत्र — तीन पत्तों वाले, बिना कटे-फटे
- कच्चा दूध, दही, घी, शहद, शक्कर — पंचामृत के लिए
- गंगाजल और ताँबे का लोटा
- धतूरा, भांग, आक (मदार) के फूल
- सफ़ेद चंदन, भस्म, अक्षत
- काले तिल और गन्ने का रस
- बेर और मौसमी फल
- रुद्राक्ष माला और शिव चालीसा / रुद्राष्टक
- चार प्रहर के लिए अलग-अलग: दूध, दही, घी, शहद
पूजा विधि
1
संकल्प
प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प — निर्जल, फलाहार या एक समय। दिन भर शिव नाम।
2
प्रथम प्रहर
सूर्यास्त के बाद पहली पूजा — दूध से अभिषेक। ‘ॐ नमः शिवाय’ और बेलपत्र।
3
द्वितीय प्रहर
दही से अभिषेक। रुद्राष्टक या शिव चालीसा का पाठ।
4
तृतीय प्रहर
घी से अभिषेक — यह प्रहर निशीथ काल के आसपास पड़ता है, जो रात की सबसे महत्वपूर्ण घड़ी है।
5
चतुर्थ प्रहर
शहद से अभिषेक, फिर गंगाजल। भोर होने तक जागरण।
6
बेलपत्र
हर प्रहर में बेलपत्र चढ़ाएँ — चिकनी सतह नीचे की ओर करके। एक बेलपत्र में तीन पत्ते होने चाहिए।
7
पारण
अगले दिन सूर्योदय के बाद, चतुर्दशी समाप्त होने पर व्रत खोलें — पंचांग से पारण का समय देखकर।
क्या करें
- बेलपत्र चिकनी सतह नीचे की ओर करके चढ़ाएँ, और तीन पत्तों वाला ही लें — कटा या फटा नहीं।
- रात के चारों प्रहर में अभिषेक करें; यही इस व्रत का असली रूप है, केवल सुबह जल चढ़ाना नहीं।
- निशीथ काल का समय पंचांग से देख लें — तृतीय प्रहर उसी के आसपास पड़ता है।
- अभिषेक कच्चे दूध से करें, उबले से नहीं।
- शिवलिंग पर चढ़ाया जल जिस नाली से निकलता है (निर्माल्य), उसे लाँघें नहीं — बगल से घूमकर परिक्रमा करें।
- पारण सूर्योदय के बाद निर्धारित समय में करें।
क्या न करें
- शिव को तुलसी, केतकी का फूल, हल्दी, कुमकुम और नारियल का पानी नहीं चढ़ता — केतकी को तो शिव ने स्वयं श्राप दिया था।
- शंख से शिव का अभिषेक नहीं होता।
- शिवलिंग की पूरी परिक्रमा नहीं की जाती — निर्माल्य तक जाकर लौट आएँ।
- आज काले वस्त्र पहनकर पूजा न करें, और चमड़े की वस्तु पूजा स्थान पर न लाएँ।
- व्रत के दिन दिन में सोना और रात में सो जाना — दोनों इस व्रत के विरुद्ध हैं; यह रात्रि जागरण का व्रत है।
- टूटा हुआ बेलपत्र और बासी फूल न चढ़ाएँ।
आरती
ॐ जय शिव ओंकारा
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥
एकानन चतुरानन पंचानन राजे।
हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥
दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज ते सोहे।
तीनों रूप निरखता त्रिभुवन जन मोहे॥
अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी।
चंदन मृगमद सोहै भाले शशिधारी॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।
सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे॥
कर के मध्य कमंडल चक्र त्रिशूलधारी।
सुखकारी दुखहारी जगपालनकारी॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥
काशी में विश्वनाथ विराजत, नंदी ब्रह्मचारी।
नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥
त्रिगुण स्वामी जी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावे॥
आकाश का अपना कैलेंडर है। आपका भी।
वही गणना आपके जन्म-क्षण पर — हर भाव, हर ग्रह, हर दशा तिथियों सहित।
