मौनी अमावस्या कब है?
उत्तर
शनिवार, 06 फ़रवरी 2027
मौन व्रत। महास्नान का दिन।
उसी दिन क्यों
- यह कौन-सी तिथि है
- माघ कृष्ण अमावस्या
सामान्य नियम से: वह दिन जिसके सूर्योदय पर यह तिथि चल रही हो।
उसके बाद
बुधवार, 26 जनवरी 2028
माघ कृष्ण अमावस्या
रविवार, 14 जनवरी 2029
माघ कृष्ण अमावस्या
यह तिथि कैसे निकली
त्योहार एक स्थिति है, तारीख़ नहीं। चांद्र मास का नाम उस राशि से पड़ता है जिसमें सूर्य उस अमावस्या पर हो जो मास आरंभ करती है, और तिथि सूर्य से चंद्रमा की दूरी है, बारह-बारह अंश में। दोनों उसी गणना से आते हैं जिससे यह साइट कुंडली बनाती है।
उत्तर भारत मास पूर्णिमा से पूर्णिमा तक गिनता है, इसलिए कृष्ण पक्ष अगले मास का नाम लेता है — वही दिन पुणे में श्रावण कृष्ण तृतीया है और दिल्ली में भाद्रपद कृष्ण तृतीया। यहाँ उत्तर की गणना है, और तिथि ऊपर छपी है ताकि कुछ भी मानना न पड़े।
क्यों मनाई जाती है
माघ की अमावस्या — कुंभ और माघ मेले का सबसे बड़ा स्नान दिन। ‘मौनी’ मुनि से है: आज मौन रखने की परंपरा है, और मान्यता है कि इसी दिन मनु का जन्म हुआ था। ज्योतिष का कारण भी है — इसी दिन सूर्य और चंद्र दोनों मकर राशि में एक साथ आते हैं, और यही योग संगम में स्नान का सबसे बड़ा कारण माना गया है। यह पितरों का भी दिन है: सर्वपितृ अमावस्या के बाद तर्पण का दूसरा सबसे बड़ा अवसर।
कथा
मनु का जन्म
मान्यता है कि इसी तिथि को स्वायम्भुव मनु प्रकट हुए — जिनसे मनुष्य शब्द बना। इसीलिए इस दिन को सृष्टि के आरंभ से जोड़ा जाता है।
अमृत की बूँद
समुद्र मंथन के बाद अमृत कलश को लेकर देव-दानव बारह दिन भागते रहे। उन दिनों में जिन चार स्थानों पर बूँदें गिरीं — प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक — वहीं कुंभ लगता है।
बारह वर्ष
देवताओं का एक दिन मनुष्यों का एक वर्ष होता है, इसलिए वे बारह दिन बारह वर्ष हुए — कुंभ का चक्र वही है।
मौन
मौन का कारण अलग है: कहा गया कि आज वाणी का संयम स्नान से भी बड़ा है। जो बोलकर स्नान करे और जो चुप रहकर — फल दोनों का एक नहीं।
सामग्री
- काले तिल — स्नान के जल में और दान दोनों के लिए
- कुश (दर्भ) और ताँबे का लोटा — तर्पण के लिए
- गंगाजल
- काले तिल के लड्डू, गुड़ और कंबल — दान की पारंपरिक वस्तुएँ
- सूर्य को अर्घ्य देने के लिए लाल फूल और रोली
- पीपल के पेड़ के लिए जल, दूध और दीपक
- जौ और चावल
पूजा विधि
1
मौन
जागने से लेकर स्नान और दान पूरा होने तक मौन रखें। जो पूरा दिन न कर सके वह प्रातःकाल तो रखे — मौन इस दिन का नाम ही है।
2
स्नान
ब्रह्म मुहूर्त में संगम, गंगा या किसी नदी में। घर पर हो तो जल में गंगाजल और काले तिल मिलाकर स्नान करें।
3
सूर्य अर्घ्य
स्नान के तुरंत बाद ताँबे के लोटे से सूर्य को जल — उसमें तिल और लाल फूल डालकर।
4
पितृ तर्पण
दक्षिण की ओर मुँह, कुश हाथ में, तिल मिला जल — पितरों के नाम तीन-तीन बार। सर्वपितृ अमावस्या के बाद यह दूसरा बड़ा दिन है।
5
पीपल पूजन
पीपल में जल-दूध चढ़ाकर परिक्रमा और दीपक। परंपरा में आज पीपल में पितरों का वास माना जाता है।
6
दान
तिल, गुड़, कंबल, अन्न और वस्त्र का दान। मौन तोड़ने से पहले दान पूरा करना चाहिए।
क्या करें
- कम से कम स्नान और दान पूरा होने तक मौन रखें — इसी से दिन का नाम है।
- स्नान के जल में काले तिल अवश्य डालें, चाहे घर पर ही स्नान हो।
- स्नान के बाद तुरंत सूर्य को अर्घ्य दें, बाद में नहीं।
- पितरों के लिए तर्पण करें, भले परिवार में किसी की तिथि आज न हो।
- दान में तिल और कंबल ज़रूर रखें — माघ की अमावस्या का यही परंपरागत दान है।
क्या न करें
- आज कोई शुभ या नया कार्य न करें — अमावस्या पर आरंभ नहीं होता।
- मौन के समय क्रोध, बहस या किसी की निंदा नहीं; टूटा मौन बोलने से नहीं, कटु बोलने से माना जाता है।
- आज पीपल या किसी पेड़ की पत्ती-टहनी न तोड़ें।
- माँस, मदिरा, प्याज़-लहसुन नहीं।
- दान लेने से पहले देना — आज कुछ लेने की परंपरा नहीं है।
आरती
श्री गंगा जी की आरती
ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता।
जो नर तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता॥
चंद्र सी जोत तुम्हारी, जल निर्मल आता।
शरण पड़े जो तेरी, सो नर तर जाता॥
पुत्र सगर के तारे, सब जग को ज्ञाता।
कृपा दृष्टि हो तुम्हारी, त्रिभुवन सुख दाता॥
एक ही बार जो तेरी, शरणागति आता।
यम की त्रास मिटाकर, परमगति पाता॥
आरती मात तुम्हारी, जो जन नित गाता।
सेवक वही सहज में, मुक्ति को पाता॥
आकाश का अपना कैलेंडर है। आपका भी।
वही गणना आपके जन्म-क्षण पर — हर भाव, हर ग्रह, हर दशा तिथियों सहित।
