नवरात्रि आरंभ कब है?
उत्तर
रविवार, 11 अक्टूबर 2026
नौ रातें, आश्विन शुक्ल प्रतिपदा।
उसी दिन क्यों
- यह कौन-सी तिथि है
- आश्विन शुक्ल 1
सामान्य नियम से: वह दिन जिसके सूर्योदय पर यह तिथि चल रही हो।
उसके बाद
गुरुवार, 30 सितम्बर 2027
आश्विन शुक्ल 1
मंगलवार, 19 सितम्बर 2028
आश्विन शुक्ल 1
यह तिथि कैसे निकली
त्योहार एक स्थिति है, तारीख़ नहीं। चांद्र मास का नाम उस राशि से पड़ता है जिसमें सूर्य उस अमावस्या पर हो जो मास आरंभ करती है, और तिथि सूर्य से चंद्रमा की दूरी है, बारह-बारह अंश में। दोनों उसी गणना से आते हैं जिससे यह साइट कुंडली बनाती है।
उत्तर भारत मास पूर्णिमा से पूर्णिमा तक गिनता है, इसलिए कृष्ण पक्ष अगले मास का नाम लेता है — वही दिन पुणे में श्रावण कृष्ण तृतीया है और दिल्ली में भाद्रपद कृष्ण तृतीया। यहाँ उत्तर की गणना है, और तिथि ऊपर छपी है ताकि कुछ भी मानना न पड़े।
क्यों मनाई जाती है
आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नौ रातें — नौ, इसलिए कि दुर्गा और महिषासुर का युद्ध नौ रात चला और दसवें दिन वह मारा गया। नौ दिन नौ रूपों के हैं: शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री। साल में चार नवरात्रि आती हैं; दो गुप्त हैं और दो — चैत्र और आश्विन — सब मनाते हैं। यह आश्विन वाली है, जिसे शारदीय नवरात्रि कहते हैं।
कथा
वरदान
महिषासुर ने ब्रह्मा से वर पाया कि उसे कोई पुरुष न मार सके। उसने स्त्री का नाम नहीं लिया — उसे लगा स्त्री से क्या ख़तरा।
स्वर्ग पर क़ब्ज़ा
उस वर के बल पर उसने देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया। देवता ब्रह्मा-विष्णु-महेश के पास गए।
तेज से जन्म
तीनों के क्रोध का तेज एक हुआ और उससे दुर्गा प्रकट हुईं। हर देवता ने अपना अस्त्र दिया — शिव का त्रिशूल, विष्णु का चक्र, इंद्र का वज्र, हिमालय का सिंह।
नौ रातें
युद्ध नौ रात चला। महिषासुर रूप बदलता रहा — भैंसा, सिंह, हाथी, मनुष्य।
दसवाँ दिन
दसवें दिन जब वह आधा भैंसे से बाहर निकला था, दुर्गा ने त्रिशूल से उसका वध किया। वही दिन विजयादशमी है।
सामग्री
- मिट्टी का पात्र, जौ के बीज और साफ़ रेत — घट स्थापना के लिए
- ताँबे या मिट्टी का कलश, गंगाजल, आम के पत्ते और नारियल
- लाल चुनरी, लाल चूड़ियाँ, सिंदूर
- अखंड दीपक के लिए पीतल का दीया और शुद्ध घी (नौ दिन जलेगा)
- दुर्गा सप्तशती की पुस्तक
- लाल फूल — गुड़हल सबसे उपयुक्त
- श्रृंगार का सामान: बिंदी, काजल, मेहँदी, चूड़ी
- नौ दिन के भोग: दिन के अनुसार — घी, शक्कर, दूध, मालपुआ, केला, शहद, गुड़, नारियल, तिल
- अष्टमी/नवमी के कन्या भोजन के लिए हलवा, पूरी, काला चना
पूजा विधि
1
घट स्थापना
पहले दिन प्रतिपदा में, अभिजित मुहूर्त या शुभ चौघड़िया में। मिट्टी के पात्र में रेत, उसमें जौ बोएँ — नौ दिन में वे अंकुरित होंगे और उन्हें ही देखकर फल पढ़ा जाता है।
2
कलश
जौ के पात्र पर कलश रखें, उसमें जल, सिक्का, सुपारी। मुँह पर आम के पत्ते और उन पर नारियल — लाल कपड़े में लपेटकर।
3
अखंड दीप
जो नौ दिन का संकल्प ले, वह दीपक जलाए और उसे बुझने न दे। घी ख़त्म होने से पहले भरते रहें।
4
रोज़ की पूजा
हर सुबह उस दिन के रूप का नाम लेकर पूजा, उस दिन का भोग, दुर्गा सप्तशती या कवच का पाठ, आरती।
5
अष्टमी/नवमी
संधि पूजा अष्टमी के अंतिम 24 मिनट और नवमी के पहले 24 मिनट में — वही क्षण जब चंड-मुंड मारे गए थे।
6
कन्या पूजन
दो से दस वर्ष की नौ कन्याएँ और एक बालक (लांगुर)। पैर धोकर, तिलक लगाकर, हलवा-पूरी-चना खिलाकर दक्षिणा।
7
विसर्जन
दशमी को कलश हटाएँ। अंकुरित जौ घर में रखें या बहते जल में — फेंकें नहीं।
क्या करें
- जौ बोने के लिए साफ़ मिट्टी या रेत लें और रोज़ थोड़ा जल दें — नौ दिन में अंकुर हरे और घने होने चाहिए।
- अखंड दीप का संकल्प तभी लें जब घर में कोई नौ दिन रहेगा। बुझ जाए तो दोष नहीं, पर संकल्प सोचकर लें।
- कन्या पूजन में कन्या की उम्र देखें — दो से दस वर्ष। एक बालक भी भैरव के रूप में ज़रूरी माना जाता है।
- व्रत रखने वाले सुबह-शाम दोनों समय दीप जलाएँ और फलाहार पर रहें।
- अष्टमी या नवमी — दोनों में से एक ही दिन कन्या भोजन होता है, दोनों दिन नहीं।
क्या न करें
- नौ दिन घर खाली न छोड़ें, ख़ासकर अखंड दीप जल रहा हो तो।
- प्याज़, लहसुन, माँस और मदिरा नौ दिन घर में नहीं।
- बाल, दाढ़ी और नाखून न काटें; यह नियम पूरे नौ दिन का है।
- कन्या पूजन में कन्याओं से काम न कराएँ और दक्षिणा देते समय भेद न करें।
- काले वस्त्र और चमड़े की वस्तुएँ पूजा स्थान से दूर रखें।
- जौ के अंकुरों को कूड़े में न डालें — जल में प्रवाहित करें।
आरती
जय अम्बे गौरी
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशिदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥
माँग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को।
उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको॥
कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै।
रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै॥
केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी।
सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी॥
कानन कुंडल शोभित, नासाग्रे मोती।
कोटिक चंद्र दिवाकर, सम राजत ज्योति॥
शुम्भ-निशुम्भ बिदारे, महिषासुर घाती।
धूम्र विलोचन नैना, निशिदिन मदमाती॥
चौंसठ योगिनि गावत, नृत्य करत भैरों।
बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू॥
तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता।
भक्तन की दुख हरता, सुख सम्पत्ति करता॥
भुजा चार अति शोभित, वर मुद्रा धारी।
मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी॥
कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती।
श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति॥
श्री अम्बेजी की आरती, जो कोई नर गावै।
कहत शिवानंद स्वामी, सुख सम्पत्ति पावै॥
आकाश का अपना कैलेंडर है। आपका भी।
वही गणना आपके जन्म-क्षण पर — हर भाव, हर ग्रह, हर दशा तिथियों सहित।
