पुत्रदा एकादशी कब है?
उत्तर
मंगलवार, 19 जनवरी 2027
शुक्ल पक्ष की एकादशी।
उसी दिन क्यों
- यह कौन-सी तिथि है
- पौष शुक्ल 11
सामान्य नियम से: वह दिन जिसके सूर्योदय पर यह तिथि चल रही हो।
उसके बाद
शनिवार, 08 जनवरी 2028
पौष शुक्ल 11
बुधवार, 27 दिसम्बर 2028
पौष शुक्ल 11
यह तिथि कैसे निकली
त्योहार एक स्थिति है, तारीख़ नहीं। चांद्र मास का नाम उस राशि से पड़ता है जिसमें सूर्य उस अमावस्या पर हो जो मास आरंभ करती है, और तिथि सूर्य से चंद्रमा की दूरी है, बारह-बारह अंश में। दोनों उसी गणना से आते हैं जिससे यह साइट कुंडली बनाती है।
उत्तर भारत मास पूर्णिमा से पूर्णिमा तक गिनता है, इसलिए कृष्ण पक्ष अगले मास का नाम लेता है — वही दिन पुणे में श्रावण कृष्ण तृतीया है और दिल्ली में भाद्रपद कृष्ण तृतीया। यहाँ उत्तर की गणना है, और तिथि ऊपर छपी है ताकि कुछ भी मानना न पड़े।
क्यों मनाई जाती है
साल में दो पुत्रदा एकादशी आती हैं — एक पौष शुक्ल में, एक श्रावण शुक्ल में। यह पौष वाली है, जिसे उत्तर भारत में वैकुंठ एकादशी भी कहते हैं। नाम ‘पुत्रदा’ ज़रूर है, पर परंपरा में इसका अर्थ संतान-सुख और वंश की रक्षा है — पुत्री के लिए भी यही व्रत रखा जाता है। इसका दूसरा नाम इसलिए है कि मान्यता है आज वैकुंठ का उत्तर द्वार खुलता है; दक्षिण भारत में इसी दिन मंदिरों में ‘स्वर्ग वासल’ से भक्तों को निकाला जाता है।
कथा
राजा सुकेतुमान
भद्रावती के राजा सुकेतुमान और रानी शैव्या को कोई संतान न थी। राजा को चिंता यह थी कि उनके बाद पितरों को जल कौन देगा।
वन में
दुःख में राजा वन की ओर निकल गए। भूख-प्यास से व्याकुल होकर वे एक सरोवर के किनारे पहुँचे जहाँ ऋषि तप कर रहे थे।
ऋषियों की बात
ऋषियों ने कहा — आज पौष शुक्ल एकादशी है, हम पुत्रदा व्रत कर रहे हैं। तुम भी करो।
व्रत
राजा ने वहीं व्रत किया और नगर लौट आए। समय पर रानी को पुत्र हुआ, जो आगे चलकर प्रजा-पालक राजा बना।
अर्थ
कथा का बिंदु संतान नहीं, निरंतरता है — जो चला आ रहा है वह आगे भी चले।
सामग्री
- विष्णु या लड्डू गोपाल की प्रतिमा
- तुलसी दल — बिना तुलसी विष्णु का भोग स्वीकार नहीं माना जाता
- पंचामृत — दूध, दही, घी, शहद, शक्कर
- पीले फूल, पीला वस्त्र, हल्दी
- मौसमी फल, नारियल, पंजीरी
- धूप, दीप, चंदन, अक्षत
- एकादशी व्रत कथा की पुस्तक
- दान के लिए अन्न और वस्त्र
पूजा विधि
1
दशमी की तैयारी
एकादशी से एक दिन पहले, दशमी को, एक ही बार सात्विक भोजन करें और सूर्यास्त के बाद कुछ न खाएँ। व्रत यहीं से शुरू होता है।
2
संकल्प
एकादशी को प्रातः स्नान कर विष्णु के सामने व्रत का संकल्प — निर्जल, फलाहार या एक समय, जो सामर्थ्य हो।
3
पूजन
पंचामृत से अभिषेक, पीले वस्त्र, पीले फूल, तुलसी दल के साथ भोग। विष्णु सहस्रनाम या एकादशी कथा का पाठ।
4
रात्रि जागरण
परंपरा में एकादशी की रात जागकर भजन-कीर्तन होता है। वैकुंठ द्वार की मान्यता इसी रात से जुड़ी है।
5
द्वादशी पारण
अगले दिन, द्वादशी में, निश्चित पारण मुहूर्त में व्रत खोलें — पंचांग से समय देखकर। पहले ब्राह्मण या किसी ज़रूरतमंद को भोजन कराएँ, फिर स्वयं।
क्या करें
- पारण द्वादशी के निश्चित मुहूर्त में ही करें। मुहूर्त निकल जाने पर व्रत का फल अधूरा माना जाता है — यह एकादशी का सबसे कड़ा नियम है।
- तुलसी दल भोग में अवश्य हो, पर तुलसी एकादशी के दिन नहीं तोड़ी जाती — एक दिन पहले तोड़कर रखें।
- दशमी की रात से ही अन्न छोड़ दें; व्रत वहीं से गिना जाता है।
- संतान के लिए यह व्रत माता-पिता दोनों रख सकते हैं।
- पारण से पहले किसी को भोजन कराएँ — परंपरा में यह अनिवार्य माना गया है।
क्या न करें
- चावल आज बिल्कुल नहीं — एकादशी को चावल का निषेध सबसे स्पष्ट नियम है, व्रत रखने वाले और न रखने वाले दोनों के लिए।
- एकादशी के दिन तुलसी न तोड़ें।
- प्याज़, लहसुन, मसूर की दाल और तामसिक भोजन नहीं।
- दिन में सोना और किसी की निंदा करना — दोनों एकादशी में वर्जित माने गए हैं।
- बाल-नाखून न कटवाएँ।
आरती
ॐ जय जगदीश हरे
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥
जो ध्यावे फल पावे, दुख बिनसे मन का।
सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ किसकी।
तुम बिनु और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥
तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतर्यामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥
आकाश का अपना कैलेंडर है। आपका भी।
वही गणना आपके जन्म-क्षण पर — हर भाव, हर ग्रह, हर दशा तिथियों सहित।
