रक्षा बंधन कब है?

उत्तर

मंगलवार, 17 अगस्त 2027

श्रावण की पूर्णिमा।

उसी दिन क्यों

यह कौन-सी तिथि है
श्रावण शुक्ल पूर्णिमा

सामान्य नियम से: वह दिन जिसके सूर्योदय पर यह तिथि चल रही हो।

उसके बाद

  • शनिवार, 05 अगस्त 2028

    श्रावण शुक्ल पूर्णिमा

  • शुक्रवार, 24 अगस्त 2029

    श्रावण शुक्ल पूर्णिमा

यह तिथि कैसे निकली

त्योहार एक स्थिति है, तारीख़ नहीं। चांद्र मास का नाम उस राशि से पड़ता है जिसमें सूर्य उस अमावस्या पर हो जो मास आरंभ करती है, और तिथि सूर्य से चंद्रमा की दूरी है, बारह-बारह अंश में। दोनों उसी गणना से आते हैं जिससे यह साइट कुंडली बनाती है।

उत्तर भारत मास पूर्णिमा से पूर्णिमा तक गिनता है, इसलिए कृष्ण पक्ष अगले मास का नाम लेता है — वही दिन पुणे में श्रावण कृष्ण तृतीया है और दिल्ली में भाद्रपद कृष्ण तृतीया। यहाँ उत्तर की गणना है, और तिथि ऊपर छपी है ताकि कुछ भी मानना न पड़े।

क्यों मनाई जाती है

श्रावण की पूर्णिमा — पर बाँधने का समय पूर्णिमा भर नहीं होता, और यही इस दिन का सबसे ज़रूरी नियम है: भद्रा में राखी नहीं बाँधी जाती। भद्रा शनि की बहन मानी जाती है और शुभ कार्यों के लिए वर्जित है; कथा यह भी है कि शूर्पणखा ने रावण को भद्रा में राखी बाँधी थी और लंका का अंत हुआ। इसीलिए कई वर्ष राखी दोपहर बाद ही बँधती है। ‘रक्षा बंधन’ का अर्थ भी भाई-बहन तक सीमित नहीं — यह वह धागा है जो रक्षा का वचन बाँधता है, इसलिए ब्राह्मण यजमान को और पुरोहित राजा को भी बाँधते रहे हैं।

कथा

द्रौपदी और कृष्ण

शिशुपाल वध के समय सुदर्शन से कृष्ण की उँगली कट गई। द्रौपदी ने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर उँगली पर बाँध दिया।

वचन

कृष्ण ने कहा — इस चीर का मूल्य मैं चुकाऊँगा। वही वचन चीरहरण के समय काम आया।

इंद्राणी

दूसरी कथा में देवासुर संग्राम में इंद्र हारने लगे तो इंद्राणी ने मंत्र सिद्ध धागा उनकी कलाई पर बाँधा और इंद्र जीत गए। यह रक्षा सूत्र की सबसे पुरानी कथा है — और इसमें बहन नहीं, पत्नी है।

बलि और लक्ष्मी

तीसरी में विष्णु बलि के द्वारपाल बन गए थे। लक्ष्मी ने बलि को राखी बाँधकर भाई बनाया और भेंट में विष्णु को माँग लिया।

अर्थ

तीनों कथाओं में धागा बाँधने वाला कमज़ोर नहीं होता — वह रक्षा का वचन लेता है, और वचन देने वाला बँध जाता है।

सामग्री

  • राखी — रेशम का धागा; परंपरा में कच्चा सूत भी चलता है
  • रोली, अक्षत, हल्दी और चंदन — तिलक के लिए
  • आरती की थाली, दीपक, कपूर
  • नारियल और मिठाई
  • भाई के लिए भेंट और बहन के लिए उपहार
  • जनेऊ — श्रावणी उपाकर्म के लिए (जो बदलते हैं)
  • कलावा — पुरोहित यजमान को इसी दिन बाँधते हैं

पूजा विधि

  1. 1

    समय देखना

    सबसे पहले पंचांग में भद्रा का समय देखें। भद्रा समाप्त होने के बाद ही राखी बाँधें — अपराह्न सामान्यतः सबसे उपयुक्त माना जाता है।

  2. 2

    थाली सजाना

    थाली में राखी, रोली, अक्षत, दीपक, मिठाई और नारियल। पहले थाली की पूजा की जाती है।

  3. 3

    तिलक और राखी

    भाई को पूर्व या उत्तर की ओर मुँह करके बिठाएँ। तिलक, अक्षत, फिर दाहिनी कलाई पर राखी। बाँधते समय — ‘येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः’।

  4. 4

    आरती

    दीपक से आरती उतारें और मिठाई खिलाएँ।

  5. 5

    वचन और भेंट

    भाई रक्षा का वचन दे और भेंट दे। यही इस धागे का पूरा अर्थ है।

  6. 6

    श्रावणी उपाकर्म

    जो जनेऊ धारण करते हैं वे आज उसे बदलते हैं — यह इसी पूर्णिमा का अलग विधान है।

क्या करें

  • राखी बाँधने से पहले भद्रा का समय ज़रूर देख लें — यह इस त्योहार का सबसे कड़ा नियम है और सबसे ज़्यादा अनदेखा किया जाता है।
  • राखी दाहिनी कलाई पर बाँधें।
  • भाई को तिलक के समय पूर्व या उत्तर की ओर मुँह करके बिठाएँ।
  • पुरानी राखी उतारकर जल में प्रवाहित करें या पेड़ के नीचे रखें, कूड़े में नहीं।
  • जिनके भाई-बहन नहीं, वे भी यह बाँध सकते हैं — कथाओं में पत्नी, पुरोहित और मित्र सब बाँधते हैं।

क्या न करें

  • भद्रा काल में राखी न बाँधें।
  • काली राखी और टूटा हुआ धागा न बाँधें।
  • तिलक के समय भाई का मुँह दक्षिण की ओर न हो।
  • राखी बाँधने से पहले भाई कुछ न खाए, और बहन तिलक से पहले।
  • आज भाई-बहन में कटु वचन न हों; धागा वचन का है, दिखावे का नहीं।

आरती

ॐ जय जगदीश हरे

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।

भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥

येन बद्धो बली राजा, दानवेन्द्रो महाबलः।

तेन त्वाम् अभिबध्नामि, रक्षे मा चल मा चल॥

जो ध्यावे फल पावे, दुख बिनसे मन का।

सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ किसकी।

तुम बिनु और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥

भाई-बहन का नाता, तुमने ही रचाया।

रक्षा सूत्र के धागे, वचन में बँधवाया॥

दीनबंधु दुखहर्ता, ठाकुर तुम मेरे।

अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥

आकाश का अपना कैलेंडर है। आपका भी।

वही गणना आपके जन्म-क्षण पर — हर भाव, हर ग्रह, हर दशा तिथियों सहित।

कहीं अटक गए, या कुछ ठीक नहीं लग रहा?

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