रथ यात्रा कब है?

उत्तर

सोमवार, 05 जुलाई 2027

जगन्नाथ रथयात्रा, आषाढ़ शुक्ल द्वितीया।

उसी दिन क्यों

यह कौन-सी तिथि है
आषाढ़ शुक्ल 2

सामान्य नियम से: वह दिन जिसके सूर्योदय पर यह तिथि चल रही हो।

उसके बाद

  • शनिवार, 24 जून 2028

    आषाढ़ शुक्ल 2

  • शुक्रवार, 13 जुलाई 2029

    आषाढ़ शुक्ल 2

यह तिथि कैसे निकली

त्योहार एक स्थिति है, तारीख़ नहीं। चांद्र मास का नाम उस राशि से पड़ता है जिसमें सूर्य उस अमावस्या पर हो जो मास आरंभ करती है, और तिथि सूर्य से चंद्रमा की दूरी है, बारह-बारह अंश में। दोनों उसी गणना से आते हैं जिससे यह साइट कुंडली बनाती है।

उत्तर भारत मास पूर्णिमा से पूर्णिमा तक गिनता है, इसलिए कृष्ण पक्ष अगले मास का नाम लेता है — वही दिन पुणे में श्रावण कृष्ण तृतीया है और दिल्ली में भाद्रपद कृष्ण तृतीया। यहाँ उत्तर की गणना है, और तिथि ऊपर छपी है ताकि कुछ भी मानना न पड़े।

क्यों मनाई जाती है

आषाढ़ शुक्ल द्वितीया — पुरी की रथ यात्रा। यह भारत का इकलौता बड़ा उत्सव है जिसमें देवता मंदिर छोड़कर सड़क पर आते हैं, और इसीलिए इसका अर्थ भी अलग है: जो लोग गर्भगृह तक नहीं जा सकते, उनके पास भगवान स्वयं आते हैं। जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा तीन अलग रथों पर तीन किलोमीटर चलकर गुंडिचा मंदिर जाते हैं — जो उनकी मौसी का घर माना जाता है — और नौ दिन बाद लौटते हैं। यात्रा से पहले पंद्रह दिन मंदिर बंद रहता है, क्योंकि ज्येष्ठ पूर्णिमा के स्नान के बाद तीनों को बुखार आ जाता है; उस अवधि को अनसर कहते हैं।

कथा

अधूरी मूर्तियाँ

राजा इंद्रद्युम्न को समुद्र में एक दिव्य काष्ठ मिला। विश्वकर्मा वृद्ध बढ़ई के रूप में आए और बोले — मैं मूर्ति बनाऊँगा, पर द्वार बंद रहेगा और कोई न देखे।

द्वार खुलना

इक्कीस दिन बाद भीतर से आवाज़ आनी बंद हो गई। रानी गुंडिचा की चिंता पर राजा ने द्वार खोल दिया।

जैसे हैं वैसे

बढ़ई जा चुका था और तीनों मूर्तियाँ अधूरी थीं — हाथ-पैर बने ही नहीं। दैववाणी हुई: इन्हें ऐसे ही स्थापित करो। जगन्नाथ आज भी उसी रूप में हैं।

मौसी का घर

गुंडिचा मंदिर उन्हीं रानी के नाम से है, और यात्रा उसी घर तक जाती है — इसीलिए इसे मौसी का घर कहा जाता है।

बहन का हठ

एक और कथा में सुभद्रा ने नगर देखने की इच्छा की, और दोनों भाई उन्हें रथ पर बिठाकर नगर घुमाने निकले। यात्रा उसी की स्मृति है।

सामग्री

  • जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का चित्र या प्रतिमा
  • छोटा रथ — घर पर यात्रा निकालने के लिए (लकड़ी या धातु का)
  • तुलसी दल, पीले फूल, नारियल
  • खिचड़ी, पोड़ा पीठा और गुड़ की मिठाई — जगन्नाथ का महाप्रसाद
  • आम, नारियल पानी और मौसमी फल
  • सोने की झाड़ू का प्रतीक — छेरा पहँरा के लिए (परंपरा में राजा रथ बुहारते हैं)
  • धूप, दीप, कपूर, चंदन
  • पीला या केसरिया वस्त्र

पूजा विधि

  1. 1

    स्नान और संकल्प

    प्रातः स्नान कर पीले वस्त्र। घर पर यात्रा निकालनी हो तो तीनों की प्रतिमाएँ छोटे रथ में स्थापित करें।

  2. 2

    पूजन

    तुलसी दल के साथ भोग — जगन्नाथ विष्णु का ही रूप हैं, इसलिए तुलसी अनिवार्य। पीले फूल, नारियल, धूप-दीप।

  3. 3

    छेरा पहँरा

    रथ को सोने की झाड़ू से बुहारना। पुरी में यह राजा करते हैं — इसका अर्थ यही है कि रथ के आगे राजा और सामान्य जन में कोई भेद नहीं।

  4. 4

    यात्रा

    रथ खींचें या घर में प्रतीक रूप से रथ को एक कमरे से दूसरे तक ले जाएँ। परंपरा कहती है रथ की रस्सी छूना भी पुण्य है।

  5. 5

    महाप्रसाद

    खिचड़ी और गुड़ की मिठाई का भोग। जगन्नाथ का प्रसाद जाति-भेद के बिना बाँटा जाता है — यह परंपरा का स्पष्ट नियम है।

  6. 6

    बहुड़ा यात्रा

    नौ दिन बाद वापसी यात्रा। जो मूल यात्रा में न जा सके वे इसमें जाते हैं।

क्या करें

  • रथ की रस्सी को स्पर्श करें या खींचें — परंपरा में यही इस दिन का मुख्य कर्म है, दर्शन नहीं।
  • भोग में तुलसी दल अवश्य रखें।
  • महाप्रसाद बिना भेदभाव के बाँटें; जगन्नाथ मंदिर की यही सबसे पुरानी परंपरा है।
  • घर पर हों तो छोटी प्रतिमा को रथ में बिठाकर प्रतीकात्मक यात्रा करें — परंपरा में इसकी छूट है।
  • बहुड़ा यात्रा (वापसी) भी उतनी ही मानी जाती है; न जा सकें तो उस दिन का स्मरण करें।

क्या न करें

  • रथ के आगे-पीछे धक्का-मुक्की न करें; भीड़ में यही सबसे बड़ा ख़तरा है।
  • आज माँस-मदिरा नहीं।
  • प्रसाद में जाति या भेद न करें — यह इस पर्व के मूल के विरुद्ध है।
  • रथ के किसी हिस्से को स्मृति चिह्न समझकर तोड़ें नहीं।
  • प्याज़-लहसुन वाला भोजन जगन्नाथ के भोग में नहीं आता।

आरती

श्री जगन्नाथ आरती

जय जगन्नाथ स्वामी, प्रभु जय जगन्नाथ स्वामी।

नील शैल पर सोहे, तुम अंतर्यामी॥

बलभद्र संग सोहे, सुभद्रा प्यारी।

तीन रथों पर चढ़कर, निकले संसारी॥

हस्त-पाद बिन सोहे, अद्भुत रूप तुम्हारा।

अधूरा रूप है फिर भी, पूरा जग सारा॥

गुंडिचा तक जाते, मौसी के घर स्वामी।

नौ दिन वहीं बिराजे, फिर लौटें नामी॥

जाति-पाँति ना पूछे, प्रसाद सब पाए।

जो रथ की रस्सी छू ले, वो भव तर जाए॥

श्री जगन्नाथ की आरती, जो कोई नर गावे।

दर्शन बिना ही पावे, जो मंदिर न आवे॥

आकाश का अपना कैलेंडर है। आपका भी।

वही गणना आपके जन्म-क्षण पर — हर भाव, हर ग्रह, हर दशा तिथियों सहित।

कहीं अटक गए, या कुछ ठीक नहीं लग रहा?

हर संदेश एक इंसान पढ़ता है — कोई बॉट नहीं। अपनी कुंडली, रिपोर्ट, भुगतान या ऑर्डर — किसी भी बारे में पूछिए। सुबह 9 से रात 9, रोज़।