शरद पूर्णिमा कब है?
उत्तर
सोमवार, 26 अक्टूबर 2026
वर्ष की सबसे उजली पूर्णिमा।
उसी दिन क्यों
- यह कौन-सी तिथि है
- आश्विन शुक्ल पूर्णिमा
सामान्य नियम से: वह दिन जिसके सूर्योदय पर यह तिथि चल रही हो।
उसके बाद
शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2027
आश्विन शुक्ल पूर्णिमा
मंगलवार, 03 अक्टूबर 2028
आश्विन शुक्ल पूर्णिमा
यह तिथि कैसे निकली
त्योहार एक स्थिति है, तारीख़ नहीं। चांद्र मास का नाम उस राशि से पड़ता है जिसमें सूर्य उस अमावस्या पर हो जो मास आरंभ करती है, और तिथि सूर्य से चंद्रमा की दूरी है, बारह-बारह अंश में। दोनों उसी गणना से आते हैं जिससे यह साइट कुंडली बनाती है।
उत्तर भारत मास पूर्णिमा से पूर्णिमा तक गिनता है, इसलिए कृष्ण पक्ष अगले मास का नाम लेता है — वही दिन पुणे में श्रावण कृष्ण तृतीया है और दिल्ली में भाद्रपद कृष्ण तृतीया। यहाँ उत्तर की गणना है, और तिथि ऊपर छपी है ताकि कुछ भी मानना न पड़े।
क्यों मनाई जाती है
आश्विन की पूर्णिमा — साल की इकलौती रात जब चंद्रमा सोलह कलाओं से पूर्ण होता है। बाक़ी पूर्णिमाओं में पंद्रह होती हैं। यही वह रात है जिसमें कृष्ण ने वृंदावन में महारास किया, और यही वह रात है जिसमें लक्ष्मी पृथ्वी पर घूमकर पूछती हैं — ‘को जागर्ति?’ कौन जाग रहा है। इसीलिए इसे कोजागरी पूर्णिमा भी कहते हैं और रात भर जागने की परंपरा है। खीर चाँदनी में इसीलिए रखी जाती है — मान्यता है कि आज की चंद्र-किरणों में अमृत उतरता है।
कथा
साहूकार की दो बेटियाँ
एक साहूकार की दो बेटियाँ थीं। बड़ी पूरा व्रत करती, छोटी बीच में तोड़ देती।
संतान
छोटी बेटी के बच्चे जन्म लेते ही मर जाते। पंडितों ने कहा — अधूरे व्रत का फल है।
बड़ी बहन का स्पर्श
एक मृत बच्चे को उसने पीढ़े पर लिटाकर कपड़े से ढक दिया और बड़ी बहन को बुलाया। बैठते समय बहन का घाघरा बच्चे को छू गया और वह रो पड़ा।
व्रत का फल
बहन ने कहा — मैं इसे मार देती तो? छोटी ने कहा, नहीं, तुम्हारे व्रत ने इसे जिलाया है। तब से यह व्रत पूरा किया जाता है, अधूरा नहीं।
महारास
दूसरी कथा यही रात वृंदावन की है। कृष्ण ने बाँसुरी बजाई, गोपियाँ आईं, और कृष्ण ने अपने को उतने रूपों में बाँटा जितनी गोपियाँ थीं — हर एक को लगा कि वे केवल उसके साथ हैं।
सामग्री
- गाय का दूध, चावल और शक्कर — खीर के लिए
- चाँदी का पात्र, या जो न हो तो काँच का (धातु में ताँबा-पीतल नहीं)
- सफ़ेद वस्त्र और सफ़ेद फूल
- लक्ष्मी और इंद्र की प्रतिमा या चित्र
- घी का दीपक — परंपरा में सौ बत्तियों वाला
- पान, सुपारी, इलायची, केसर
- जल से भरा कलश
पूजा विधि
1
व्रत और पूजा
दिन भर उपवास या फलाहार। संध्या को लक्ष्मी और इंद्र का पूजन — इंद्र इसलिए कि वर्षा का मौसम आज समाप्त माना जाता है।
2
खीर बनाना
गाय के दूध की खीर, केसर और इलायची डालकर। चाँदी के पात्र में — चाँदी को इस रात की किरणों के लिए सबसे उपयुक्त माना गया है।
3
चाँदनी में रखना
रात के लगभग दस बजे से, जब चंद्रमा ऊपर हो, खीर खुले में जालीदार कपड़े से ढककर रखें। सीधे नीचे — छत या आँगन में, किसी छाया में नहीं।
4
जागरण
रात भर भजन, कीर्तन या लक्ष्मी सूक्त का पाठ। कोजागरी का पूरा अर्थ जागना है।
5
प्रसाद
मध्यरात्रि के बाद खीर का भोग लगाकर सबको बाँटें। दमा और श्वास के रोगी इसे विशेष रूप से लेते हैं — यह परंपरा का हिस्सा है।
क्या करें
- खीर पूरी तरह खुले आसमान के नीचे रखें — पेड़, छज्जे या छत की छाया में रखने से बात ही ख़त्म हो जाती है।
- गाय का दूध ही लें, और चाँदी का पात्र मिल जाए तो सबसे अच्छा।
- व्रत रखें तो पूरा रखें — इस दिन की पूरी कथा अधूरे व्रत पर ही है।
- रात भर जागें या कम से कम मध्यरात्रि तक; लक्ष्मी का प्रश्न ही यही है।
- खीर को जालीदार साफ़ कपड़े से ढकें — किरण आए, धूल न आए।
क्या न करें
- ताँबे या पीतल के बर्तन में खीर चाँदनी में न रखें; चाँदी, काँच या मिट्टी।
- आज तामसिक भोजन, माँस-मदिरा नहीं — व्रत न भी हो तो भी नहीं।
- खीर सुबह तक न रखें; मध्यरात्रि के बाद बाँट दें।
- इस रात जल्दी सोना परंपरा के विरुद्ध है — कोजागरी का अर्थ ही जागरण है।
- बासी या डिब्बे का दूध न लें।
आरती
ॐ जय लक्ष्मी माता
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निशिदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता॥
उमा रमा ब्रह्माणी, तुम ही जग माता।
सूर्य चंद्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥
दुर्गा रूप निरंजनि, सुख सम्पत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि सिद्धि धन पाता॥
तुम पाताल निवासिनि, तुम ही शुभदाता।
कर्म प्रभाव प्रकाशिनि, भवनिधि की त्राता॥
जिस घर तुम रहती हो, ताँहि में हैं सद्गुण आता।
सब सम्भव हो जाता, मन नहीं घबराता॥
महालक्ष्मी जी की आरती, जो कोई नर गाता।
उर आनंद समाता, पाप उतर जाता॥
आकाश का अपना कैलेंडर है। आपका भी।
वही गणना आपके जन्म-क्षण पर — हर भाव, हर ग्रह, हर दशा तिथियों सहित।
