वट सावित्री अमावस्या कब है?
उत्तर
शुक्रवार, 04 जून 2027
पति की दीर्घायु के लिए।
उसी दिन क्यों
- यह कौन-सी तिथि है
- ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या
सामान्य नियम से: वह दिन जिसके सूर्योदय पर यह तिथि चल रही हो।
उसके बाद
बुधवार, 24 मई 2028
ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या
मंगलवार, 12 जून 2029
ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या
यह तिथि कैसे निकली
त्योहार एक स्थिति है, तारीख़ नहीं। चांद्र मास का नाम उस राशि से पड़ता है जिसमें सूर्य उस अमावस्या पर हो जो मास आरंभ करती है, और तिथि सूर्य से चंद्रमा की दूरी है, बारह-बारह अंश में। दोनों उसी गणना से आते हैं जिससे यह साइट कुंडली बनाती है।
उत्तर भारत मास पूर्णिमा से पूर्णिमा तक गिनता है, इसलिए कृष्ण पक्ष अगले मास का नाम लेता है — वही दिन पुणे में श्रावण कृष्ण तृतीया है और दिल्ली में भाद्रपद कृष्ण तृतीया। यहाँ उत्तर की गणना है, और तिथि ऊपर छपी है ताकि कुछ भी मानना न पड़े।
क्यों मनाई जाती है
ज्येष्ठ अमावस्या — सुहागिन स्त्रियों का व्रत, पति की आयु के लिए। यही वह इकलौता बड़ा व्रत है जिसमें पूजा किसी देवता की नहीं, एक स्त्री की होती है: सावित्री की, जो यमराज से बहस करके अपने पति के प्राण वापस ले आई। बरगद इसलिए है कि सत्यवान ने प्राण उसी पेड़ के नीचे छोड़े थे और सावित्री उसी के नीचे बैठकर यम से बात करती रही। उत्तर भारत में यह अमावस्या को है और गुजरात-महाराष्ट्र में ज्येष्ठ पूर्णिमा को — दोनों परंपराएँ चलती हैं।
कथा
चुनाव
राजकुमारी सावित्री ने अपने लिए सत्यवान को चुना — वनवासी, अंधे राजा का पुत्र। नारद ने कहा, यह एक वर्ष में मर जाएगा। उसने कहा, मैं एक ही बार चुनती हूँ।
वह दिन
एक वर्ष बाद, तय दिन, सत्यवान लकड़ी काटने गया। सिर में पीड़ा हुई और वह बरगद के नीचे सावित्री की गोद में लेट गया।
यम
यम स्वयं आए और उसके प्राण लेकर दक्षिण दिशा में चल दिए। सावित्री पीछे-पीछे चलती रही।
तीन वर
यम ने कहा, लौट जाओ। वह नहीं लौटी। प्रसन्न होकर यम ने वर दिए — पहले में उसने ससुर की आँखें माँगीं, दूसरे में उनका खोया राज्य।
तीसरा वर
तीसरे वर में उसने सौ पुत्र माँगे। यम ने ‘तथास्तु’ कह दिया — और तब उसने कहा: मैं पतिव्रता हूँ, और सत्यवान के बिना पुत्र कैसे होंगे? यम को अपना वचन निभाना पड़ा। बहस से जीता गया वर, याचना से नहीं।
सामग्री
- बरगद के पेड़ के लिए कच्चा सूत — परिक्रमा में लपेटने को
- जल का लोटा, रोली, अक्षत, हल्दी
- बाँस का पंखा — यम से पति को बचाने के प्रतीक रूप में
- सावित्री-सत्यवान का चित्र या मिट्टी की मूर्तियाँ
- भीगे चने — इस व्रत का निश्चित प्रसाद
- आम, लीची, जामुन — ज्येष्ठ के फल
- सिंदूर, चूड़ी, बिंदी और श्रृंगार का सामान
- पूरी, पूए और मिठाई; बरगद के नीचे बाँटने के लिए
पूजा विधि
1
संकल्प
प्रातः स्नान कर सोलह श्रृंगार करें और व्रत का संकल्प लें — पति की दीर्घायु के लिए। परंपरा में यह निर्जला व्रत है।
2
बरगद के नीचे
बरगद के पेड़ के पास जाकर जड़ में जल चढ़ाएँ, रोली-अक्षत लगाएँ, और मिठाई-फल अर्पित करें।
3
परिक्रमा
कच्चा सूत लेकर पेड़ के चारों ओर 7, 11 या 108 बार परिक्रमा करते हुए धागा लपेटें — जितनी परंपरा हो।
4
पंखा झलना
सावित्री-सत्यवान के चित्र या पेड़ के सामने बाँस का पंखा झलें — यह उस रात का प्रतीक है जब सावित्री यम के पीछे चलती रही।
5
कथा
सावित्री-सत्यवान की कथा सुनें, हाथ में भीगे चने लेकर।
6
पारण
कथा के बाद सास या बड़ी स्त्री के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें, फिर भीगे चने और फल से व्रत खोलें।
क्या करें
- व्रत बरगद के पेड़ के नीचे ही करें; न मिले तो घर पर बरगद की टहनी गमले में लगाकर पूजा करें — परंपरा में यह छूट है।
- परिक्रमा की संख्या पहले तय कर लें और उतनी ही पूरी करें।
- प्रसाद में भीगे चने अवश्य हों — इसी से व्रत खोला जाता है।
- पारण से पहले सास या घर की बड़ी स्त्री का आशीर्वाद लें।
- जिनका उपवास नहीं होता वे भी कथा सुन सकती हैं; कथा इस व्रत का मुख्य हिस्सा है।
क्या न करें
- व्रत के दिन बरगद की टहनी या पत्ते न तोड़ें — पूरा व्रत उसी पेड़ के लिए है।
- पारण से पहले जल भी नहीं; यह निर्जला व्रत है।
- आज काले या सफ़ेद वस्त्र न पहनें; लाल, पीला या हरा।
- श्रृंगार अधूरा न रखें — सोलह श्रृंगार इस व्रत का हिस्सा माना जाता है।
- कथा बीच में न छोड़ें और परिक्रमा अधूरी न छोड़ें।
आरती
सावित्री माता की आरती
जय सावित्री माता, मैया जय सावित्री माता।
पति की आयु बढ़ाने, तूने यम को हराया॥
मद्र देश की बेटी, अश्वपति की प्यारी।
सत्यवान को वरकर, बनी पतिव्रत धारी॥
नारद ने कहा था, वर्ष एक की काया।
फिर भी तूने चुनकर, वचन नहीं बदलाया॥
वट के नीचे बैठी, यम से बात करी तू।
तीन वरों की डोरी, ऐसी बाँध धरी तू॥
बुद्धि से जीता तूने, जो बल से न मिलता।
नारी की गरिमा का, तू ही है उजियारा॥
जय सावित्री माता की आरती, जो कोई नर-नारी गावे।
सुख सौभाग्य बढ़ावे, कुल में यश छावे॥
आकाश का अपना कैलेंडर है। आपका भी।
वही गणना आपके जन्म-क्षण पर — हर भाव, हर ग्रह, हर दशा तिथियों सहित।
